मजबूर मजदूर

यह धूल भूल, कष्टों का शूल
मजदूरी किसे सुहाती है?
खुद को निर्माणी, स्वाभिमानी
कह करके मन बहलाती है।।
 

भौतिक रचना को कहे अनमोल,
प्रभु की रचना पर कुछ तो बोल?
ये थके पाँव, महलों के घाव
प्रतिदिन की व्यथा बताती है।।
 

वैभव की सृष्टि पर, हेय दृष्टि
बस यही तो निशदिन पाया है।
तुम सब की खुशियों के ख़ातिर,
बस गीत सृजन का गाया है।।
 

वसुधा कुटुम्ब की नीति दूर,
संसार नीति है अति क्रूर ।
विधि की नियति को मान महल,
माटी स्वीकार करे मजदूर।।

अपने विचार साझा करें




1
ने पसंद किया
679
बार देखा गया

पसंद करें


  परिचय

"मातृभाषा", हिंदी भाषा एवं हिंदी साहित्य के प्रचार प्रसार का एक लघु प्रयास है। "फॉर टुमारो ग्रुप ऑफ़ एजुकेशन एंड ट्रेनिंग" द्वारा पोषित "मातृभाषा" वेबसाइट एक अव्यवसायिक वेबसाइट है। "मातृभाषा" प्रतिभासम्पन्न बाल साहित्यकारों के लिए एक खुला मंच है जहां वो अपनी साहित्यिक प्रतिभा को सुलभता से मुखर कर सकते हैं।

  Contact Us
  Registered Office

47/202 Ballupur Chowk, GMS Road
Dehradun Uttarakhand, India - 248001.

Tel : + (91) - 7534072808
Mail : info@maatribhasha.com