ऐ कलपुर्ज़े मानव  Sandeep Kumar Threja

ऐ कलपुर्ज़े मानव

Sandeep Kumar Threja

(1)
ऐ कलपुर्जे मानव अब तो हो गंभीर,
तेरे कारण ही तो है जग की यह बर्बर तस्वीर,
जहाँ तक दीठ घुमाओ लगी नर कंकालों की भीड़,
हाहाकार मचा है चारों ओर, लगी केवल जान बचाने की हीड।
 

(2)
ऐ कलपुर्जे मानव अब तो हो गंभीर,
उत्पीड़न कर भेदा तूने हर पल प्रकृति शरीर,
अहंकार का बोझ उठाए समझे खुद को शूरवीर,
आज सृष्टि ने कहर ढाया काटी हर ज़ंज़ीर।
 

(3)
ऐ कलपुर्जे मानव अब तो हो गंभीर,
मद में काटे वन, शैल झुकाए, मैल किए सब नीर,
अट्टालिकाओं का जंगल बुना, दफनाया अपना ज़मीर,
भूल गया तू सारा ज्ञान, क्या बोले नानक, क्या कबीर।
 

(4)
ऐ कलपुर्जे मानव अब तो हो गंभीर,
दम्भ में क्षीण हुआ तेरा आत्म, जर्जर हुआ शरीर,
अब ना संभला तो अगली नस्लों को क्या देगा तकरीर,
क्या तू लौटाएगा उनको विनाश भारी वीभत्स जागीर।
 

(5)
ऐ कलपुर्जे मानव अब तो हो गंभीर,
चल अचल को किया क़ैद बनाकर तूने मनमाने प्राचीर,
डरा छिपा बैठा है आज खाकर अपने ही हृदय पर तीर,
एहसास तो हुआ होगा आज कैसी होती पीड़।
 

(6)
ऐ कलपुर्जे मानव अब तो हो गंभीर,
मेलमिलाप छूटा, आज तो इंसा को देख इंसा खींचे दूर लक़ीर,
बना बैठा था निर्लज तू तो पूरे जग का रकीब,
दौलत, शौहरत, मान होते पर भी बना गया तू आज फ़क़ीर।
 

(7)
ऐ कलपुर्जे मानव अब तो हो गंभीर,
जीना है तो ऐसे जी जैसे निश्छल नदिया, पावन समीर,
जी लेने दे वन मानस, धरा गगन, बिन बने उनका मीर,
कृतज्ञ हो साकार बन कर नमन बन शाकिर।
 

(8)
ऐ कलपुर्जे मानव अब तो हो गंभीर,
मत कर विध्वंस जन मानव का होकर और अधीर,
मत भूल तू केवल है धरा पर एक राहगीर,
कर समर्पण, और बदल दे इस युग की तस्वीर।

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