सारा देश हमारा

सारा देश हमारा बालकवि बैरागी

सारा देश हमारा

बालकवि बैरागी | वीर रस | आधुनिक काल

केरल से कारगिल घाटी तक
गोहाटी से चौपाटी तक 
सारा देश हमारा 
जीना हो तो मरना सीखो 
गूंज उठे यह नारा 
सारा देश हमारा 
केरल से कारगिल घाटी तक...

लगता है ताजे कोल्हू पर जमी हुई है काई
लगता है फिर भटक गई है भारत की तरुणाई
कोई चीरो ओ रणधीरो !
ओ जननी के भाग्य लकीरों !
बलिदानों का पुण्य मुहूरत आता नहीं दुबारा 
जीना हो तो मरना सीखो गूंज उठे यह नारा 
सारा देश हमारा 
केरल से कारगिल घाटी तक...

घायल अपना ताजमहल है ,घायल गंगा मैया 
टूट रहे हैं तूफानों में नैया और खेवैया 
तुम नैया के पाल बदल दो 
तूफानों की चाल बदल दो 
हर आंधी का उतार हो तुम,तुमने नहीं विचारा
जीना हो तो मरना सीखो गूंज उठे यह नारा 
सारा देश हमारा 
केरल से कारगिल घाटी तक...

कहीं तुम्हें परवत लड़वा दे ,कहीं लड़ा दे पानी 
भाषा के नारों में गम है ,मन की मीठी वाणी 
आग दो इन नारों में 
इज्ज़त आ गई बाजारों में 
कब जागेंगे सोये सूरज ! कब होगा उजियारा 
जीना हो तो मरना सीखो गूंज उठे यह नारा 
सारा देश हमारा 
केरल से कारगिल घाटी तक...

संकट अपना बाल सखा है इसको कंठ लगाओ 
क्या बैठे हो न्यारे-न्यारे मिलकर बोझ उठाओ 
भाग्य भरोसा कायरता है 
कर्मठ देश कहाँ मरता है 
सोचो तुमने इतने दिन में कितनी बार हुंकारा 
जीना हो तो मरना सीखो गूंज उठे यह नारा 
सारा देश हमारा 
केरल से कारगिल घाटी तक...

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