आनेवाला खतरा

आनेवाला खतरा रघुवीर सहाय

आनेवाला खतरा

रघुवीर सहाय | अद्भुत रस | आधुनिक काल

इस लज्जित और पराजित युग में
कहीं से ले आओ वह दिमाग़
जो खुशामद आदतन नहीं करता

कहीं से ले आओ निर्धनता
जो अपने बदले में कुछ नहीं माँगती
और उसे एक बार आँख से आँख मिलाने दो

जल्दी कर डालो कि पहलने-फूलनेवाले हैं लोग
औरतें पिएँगी आदमी खाएँगे
एक दिन इसी तरह आएगा
कि किसी की कोई राय न रह जाएगी
क्रोध होगा पर विरोध न होगा
अर्जियों के सिवाय
ख़तरा होगा ख़तरे की घण्टी होगी
और उसे बादशाह बजाएगा
 

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