हम धुएँ में जब ज़रा उतरे, धुआँ खुलने लगा

हम धुएँ में जब ज़रा उतरे, धुआँ खुलने लगा राजेश रेड्डी

हम धुएँ में जब ज़रा उतरे, धुआँ खुलने लगा

राजेश रेड्डी | शांत रस | आधुनिक काल

हम धुएँ में जब ज़रा उतरे, धुआँ खुलने लगा ।
राख में मलबा कुरेदा तो मकाँ खुलने लगा ।

जैसे-जैसे उस तआल्लुक़ का गुमाँ खुलने लगा,
क्या नहीं था और क्या था दरमियाँ खुलने लगा ।

हमने तो उसके इक आँसू को ज़रा खोला था बस,
फिर तो अपने आप ही वो बेज़ुबाँ खुलने लगा ।

नाउमीदी, अश्क़, तनहाई, उदासी, हसरतें,
रफ़्ता-रफ़्ता ज़िन्दगी का हर निशाँ खुलने लगा ।

हमने जब छोड़ा उसे दैरो-हरम में ढूँढ़ना,
बन्द पलकों में हमारी लामकाँ खुलने लगा ।

हमने अपनी ज़ात से बाहर रखा पहला क़दम,
और हमारे सामने सारा जहाँ खुलने लगा ।

जैसे-जैसे दोस्तों से दोस्ती गहरी हुई,
पीठ के हर ज़ख्म का इक-इक निशाँ खुलने लगा ।

उम्र ढलने पर समझ में ज़िन्दगी आने लगी,
जब सिमटने लग गए पर, आसमाँ खुलने लगा ।

अपने विचार साझा करें


  परिचय

"मातृभाषा", हिंदी भाषा एवं हिंदी साहित्य के प्रचार प्रसार का एक लघु प्रयास है। "फॉर टुमारो ग्रुप ऑफ़ एजुकेशन एंड ट्रेनिंग" द्वारा पोषित "मातृभाषा" वेबसाइट एक अव्यवसायिक वेबसाइट है। "मातृभाषा" प्रतिभासम्पन्न बाल साहित्यकारों के लिए एक खुला मंच है जहां वो अपनी साहित्यिक प्रतिभा को सुलभता से मुखर कर सकते हैं।

  Contact Us
  Registered Office

47/202 Ballupur Chowk, GMS Road
Dehradun Uttarakhand, India - 248001.

Tel : + (91) - 7534072808
Mail : info@maatribhasha.com