आवन सुन्यो है मनभावन को भावती ने 

आवन सुन्यो है मनभावन को भावती ने  देव

आवन सुन्यो है मनभावन को भावती ने 

देव | शृंगार रस | रीतिकाल

आवन सुन्यो है मनभावन को भावती ने 
 
आँखिन अनँद आँसू ढरकि ढरकि उठैं ।
देव दृग दोऊ दौरि जात द्वार देहरी लौँ 
 
केहरी सी साँसे खरी खरकि-खरकि उठैँ । 
टहलैँ करति टहलैँ न हाथ पाँय रँग 
 
महलै निहारि तनी तरकि तरकि उठैं ।
सरकि सरकि सारी दरकि दरकि आँगी 
 
औचक उचौहैँ कुच फरकि फरकि उठैँ ।

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