तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार

"आज सिंधु ने विष उगला है, लहरों का यौवन मचला है,
आज हृदय और सिंधु में, साथ उठा है ज्वार,
तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार"

'शिवमंगल सिंह सुमन' की यह पंक्तियाँ अद्भुत प्रेरणादायक है। हमे यदि जिंदगी के जंग में फतह हासिल करना है, आगे बढना है तो हमे कठिनाईयों से, मुश्किलों से टकराना होगा। नाविक को यदि नदी पार करनी है, तो उसे तूफानों, कठिनाईयों का सामना करना ही होगा।

"मुश्किलों का सीना चीर कर ही सफलता की नदी बहती है"

महावीरों  को विपरीत परिस्थितियों से टकराने का शौक होता है। महावीरों के हृदय में हिम्मत, साहस निरन्तर उमड़ता रहता है। भीषण परिस्थितियों से टकराने के लिए वे सदा उत्सुक रहते है। जैसे वीर अभिमन्यु का रोम रोम युद्ध के नाम पर जाग उठता था। कठिनाईयों से लोहा लेना तो वीरता की शोभा होती है। डर के आगे ही जीत होती है।महावीर तो जोखिम उठाने के लिए सदा तैयार रहते है।अटूट निश्चय और दृढ़ इक्षाशक्ति से वे भीषण बाधाओं के बीच भी निरंतर संघर्ष करते रहे और उन्नति के शिखर पर पहुँचते है। दृढ़ संकल्प पीछे लौटने के सारे दरवाजे बंद कर देता है, दृढ-संकल्पी मनुष्य सारी बाधाओं को रौंद देता है और सफलता उसके कदम चूम लेती है।

जब संघर्षशील व्यक्ति अपने अंतिम साँस तक, अंत समय तक अद्भुत संघर्ष करता है तो दुनिया की हर मुश्किल उसके सामने नतमस्तक हो जाती है। हिम्मती नाविक के आगे सागर की क्षमता भी कम पड़ जाती है। अद्भुत मानवीय प्रयासों के आगे पर्वत भी शीश झुकाता है। दशरथ मांझी ने अपने अद्भुत प्रयास, साहस से पहाड़ का सीना चीर कर रास्ता बनाया।

"घनघोर वर्षा हो रही थी,तूफानों का समय था, बिजली नहीं थी,घनघोर अँधेरा था। इन विकट परिस्थितियों में भी जब बालिका ने समुंद्र में तूफानों में फँसे लोगों के चिल्लाने की आवाज सुनी तो वह सबके रोकने के बावजूद भी नाव लेकर गयी और तूफानों में डूब रहे लोगों को निकाला। अद्भुत साहसिक प्रयास था।"

ऐसे कई नाविकों की दास्तान है जिन्होंने अंतिम आस, अंतिम साँस तक तूफानों से संघर्ष किया ,तूफानों का सीना चीरकर खुद को, कभी लोगों को बचाया।

"साहस, संघर्ष के आगे पर्वत भी शीश झुकाता है।
हिम्मती नाविक के आगे सागर भी कम पड़ जाता है।
जब हो बुलंद हौसला तो तूफ़ान भी छँट जाता है "

जीवन में कभी हार मत मानना चाहिए। जीवनके चुनौतियो को स्वीकार करना चाहिए। यदि कोई संघर्ष नहीं है तो प्रगति नहीं है। मनुष्य का व्यक्तित्व संघर्ष से ही निखरता है। संघर्ष से लड़ने के बाद व्यक्तिव सोने के समान चमक उठता है। परिस्थियों पर विजय का सच्चा मार्ग है कि हम खुदको परिस्थियों से अधिक प्रबल और शक्तिशाली बना ले। निश्चित उद्देष्य वाले व्यक्ति कुछ भी प्राप्त कर सकते है और कोई भी इच्छाशक्ति, शक्ति उन्हें रोक नहीं सकती है। परिस्थितियों के अत्याचारी हाथ ऐसे संकल्पवान को अधिक देर तक अपनी मुट्ठी में दबोच कर नहीं रख सकते। ऐसे व्यक्ति के लिए परिस्थियां स्वयं हट कर दूसरी ओर मार्ग दे देता है।

अद्भुत मानवीय प्रयासों के आगे परिस्थितियों को, प्रकृति को हमेशा झुकना पड़ा है। महामुनि अगस्त के आगे पर्वत राज विंध्याचल को भी शीश झुकाना पडा और उसका अहंकार चूर-चूर हो गया। बालक ध्रुव ने अद्भुत कष्ट झेल कर अपने अद्भुत तप से भगवान विष्णु को प्रसन्न कर अद्भुत पद प्राप्त किया।भागीरथी ने अद्भुत तप किया,भीषण कष्ट झेला,पहले भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न किया, बाद में भगवान शिव को प्रसन्न किया, अनेक वर्षों तक घनघोर तप किया, अंत में गंगा को स्वर्ग से धरती पर लाया। दृढ निश्चयी ब्यक्ति को उसका लक्ष्य रूपी ध्रुवतारा बड़ी से बड़ी बाधाओं को पार करने की शक्ति देता है और वह परिस्थितियों के तूफानों में भी निरन्तर बढता जाता है और अपने लक्ष्य पर पहुँच जाता है।

मनुष्य परिस्थितियों का दास नही वरन स्वामी और नियंत्रणकर्ता है। अद्भुत मानवीय इच्छाशक्ति, अटल, अटूट विश्वास से मनुष्य विश्वको अपनी इच्छा के सांचे में ढाल लेता है। अगर इंसान में संघर्ष और कठिन परिश्रम करने की ललक हो तो दुनिया का कोई ऐसा मुकाम नहीं है जिसे हासिल ना किया जा सके। अभीष्ट सफलता के लिए हमें एक लक्ष्य ले कर उसका चिंतन करना होगा। दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे साधन आभाव, सहयोग आभाव, तमाम बाधाएँ भी नतमस्तक हो जाती है।

"मानव जब जोर लगता है, पत्थर भी पानी बन जाता है"

परिस्थितियों से लोहा ले कर भीषण संघर्ष कर ही मनुष्य महान बनता है। परिस्थितयों, कठोनयों से लोहा लेने के लिए हमें सदा तैयार रहना चाहिए। अपने अंतिम सांस तक, अंतिम आस तक संघर्ष करना चाहिए। कभी भी हर नहीं मानना चाहिए। अपने अंदर परिस्थियों से टकराने का जज़्बा लाना चाहिए।

अद्भुत प्रयास से, संघर्ष से जब मानव परिस्थितयों को अपने आगे नतमस्तक कर देता है तो वह मानव इतिहास में महामानव के रूप में अमर हो जाता है। हमें यदि सफलता चाहिए तो संघर्षरूपी आग में खुद को तपाना होगा।

"सोना तप कर ही कुंदन बनता है"

हमे किसीभी परिस्थिति में हार नहीं मानना होगा। मूलतः किसी क्षेत्र में चरम शिखर पर पहुँचवाले व्यक्ति ऐसे दृढ़ निश्चयी व्यक्ति जो अथक श्रम और अध्यवसाय से निरन्तर अपने लक्ष्य की ओर गतिशील रहते है, किसी भी परिस्थिति में रुकते, हार नहीं मानते है।

"जो तूफानों से टकराता है,
कठिनाईयों से नहीं घबराता है,
साहस धैर्य से निरन्तर
बढ़ता जाता है
वहीं सफलता पाता है।"

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