नियति

मेरी बर्तनवाली की बच्ची रोज़ शाम मेरे घर आती है
उम्र कुछ चार - पाँच साल, कीचड़ भरी आँख, बहती सी नाक,
उलझे हैं बाल, साँवले से गाल, मैली सी फ्रॉक ।
मुँह में उँगली दबाये जो पहली दफ़े देखा तो पता चला,
कि गरीबों के बच्चों में भी मासूमियत होती है भला ।
हिलते - डुलते, मुझको देख, जो वो मुस्कुरा सी गई,
चाँदनी ने ठुमका लगाया, किरणें खिलखिला सी गईं ।
फिर तो रोज़ आध - एक घंटे का काम हो गया,
घर का बाग़ किसी सोनजुहू की कली खिलने के नाम हो गया ।
पूछे जाने पर वो अक्सर ये झूमकर कहती है,
कि बाबू उसे 'नियति' और अम्मा उसे 'आशा' कहती हैं ।
नाम बताने के बदले वो एक टॉफ़ी की माँग करती है,
पर मेरी माँ मुझे डाँटती है, बेकार ही ये तेरे सिर चढ़ती है ।
वो नन्ही - सी जान न जाने कैसे, सबकुछ समझके चुप हो चली,
जो वादा की हुई आठ आने की टॉफ़ी उसे आज तक ना मिली ।
पर ये समझदार बच्ची, फ़ोन पे गाना सुन, फिर बच्ची बन जाती है,
एक हाथ से फ्रॉक पकड़े, दूजा मुँह में डाले, वो घूमघूमकर नाचती - गाती है ।
कभी इठलाकर वो मेरे कंधे पे चढ़ती है,
चुटकी भर शरारत, भूली हुई मासूमियत, वो मेरी दाढ़ी पे मढ़ती है ।
उसकी तुतलाती जबान से मेरी ज़िन्दगी की जबान भी तोतली हो चली है,
उसकी मिचमिचाती आँखों से मेरी टेंशन भी कुछ पोपली हो चली है ।
आलम ये है, कि उसके साथ जो बचकाने से खेल खेलने लग जाता हूँ,
बड़े होने कि ज़िम्मेदारियाँ भूल, बादलों की झिलमिल में खोता जाता हूँ ।
 

अपनी हँसी के बीच सोचा, उसको भी उसका नाम सिखा दूँ,
अक्षर - भर की कलम पकड़वा, आशा में कहीं आशा सजा दूँ ।
अब रोज़ मेरे पीछे मटक - मटकके वो ए बी सी दोहराती,
जाते जाते बिना भूले, कन्ना पातमित बिद्दालय के किस्से बतलाती ।
दीपक उसका डब्बा खा जाता है, महक उसे डांस सिखाती है,
और सब तो नया होता, पर मैडम तो ए बी सी ही पढ़ाती है ।
किसी श्रेया ने डॉक्टरनी बनने का नया ताज़ा सपना क्या बता दिया,
बात तो जम गयी, आशाजी ने भी डॉक्टरनी का रट्टा लगा लिया ।
अगले रोज़, उसके सवेरे भी आने पे जो सवाल किया,
माँ ने नम आँखों से कहा - बाप ने उसे स्कूल से निकाल दिया ।
जो आशा को नियति ने पछाड़ा, मेरे दिल ने भी ने भी कचोट मारी,
कि मन - तू ऊँचे सपने क्यों देखता है, तुझे ऐसी क्या बीमारी ?
पर सोचता हूँ, तुझमें और मुझमें आखिर अंतर क्या था ?
मेरे रास्ते तेरे लिए बंद -
धरती एक, फैला वितान एक, शून्य के नीचे जीवन के अंदर क्या था ?
तू कम मासूम, तू काली, मैली, गरीबी से सनी है,
मेरे भीतर खून, तो तुझमें नाली; मैं माटी तू कीच से बनी है ।
जो दिल मुझमें धड़कता, क्या तुझमें नहीं है ?
कोई फ़र्क है भी, या ये बस दुनिया का दस्तूर भर है,
तेरी नहीं, जिन हाथों ने तुझे पहले उठाया, उनकी गरीबी का कसूर भर है ।
बस चलता, तो वो हर मौका जो मुझे मिला, तुझे भी देता,
पर हा ! ये जकड़े हाथ - दास हूँ - आखिर कर भी क्या लेता ?
तेरा चाँद बुझ गया, शांत हो गयी, शरारत छिप गई, नज़रों की चमक जाने लगी,
चुपके से माँ के बगल बैठ, साथ तू भी, बर्तन धुलवाने लगी ।

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