बूझकर भी जलना आता है

अखण्ड दीप का अखण्ड ज्योति हु,
बूझकर भी जलना आता है।
कफन बाध सीमा पर चलता दुश्मन भी घबराता है,
मेरे शौर्य के आगे दुश्मन नतमस्तक हो जाता है।
देख हमारी छाती को पर्वत सिहर सा जाता है,
मेरे एक हुंकारों पे शेरो का गर्जन रुक जाता है।
 

अखण्ड ज्योति का अखण्ड दीप हु,बूझकर भी जलना आता है।
आधी और तुफानो के रुख को मोड़ मैं देता हूं,
वर्षा जैसे ऋतुओ को डटकर सामना करता हु।
आती है जब सरद ऋतु तो अपनी वर्दी की अग्नि से
सर्द को गर्म कर देता हूं,
आती है ग्रीष्म ऋतु तो मा भारती के सीतल कि छाव आँचल में यू सहन कर लेता हूं।
अखण्ड दीप का अखण्ड ज्योति हु बूझकर भी जलना आता है।
इतिहास हमारा क्या लिखेगा,हम इतिहास लहू से लिखते है।
देकर अपने प्राणों की आहुति अमिट सदा के लिए हो जाते है,
मा भारती के आंचल का तिरंगा ओढ़कर हम सहीद हो जाते है।
अखण्ड दीप का अखण्ड ज्योति हु बूझकरभी जलना आता है

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