कृषक पुकार

है पशुपालक, हैं चक्रपाणि बन्धु !
है परमेश्वर प्रभु है भगवन्, है प्रजापालक दया सिन्धु !
है चतुरानन वृजवासी घट-घट वासी, करूणावतार!
है सहस्त्र भुजबल गदाधारी, है कृषकेश्वर शेषावतार!
 

प्रकृति सुशोभित हो जाये, खुशहाली का फैले प्रकाश
सब भव्य श्रष्टी के पालक हो, कर दो कुकृति का सर्वनाश
 

हरित रंग की वसुधा पर, सस्यों की अलंकृत पृथा रहे
अन्वेषण का अनुशीलन हो, काश्तकारी का पता रहे
 

हर चरमोत्कर्ष प्रस्फुटित हो इतने, सम्यक हो समृद्धि युक्त रहे
देशों दिशाऐं झुम झुम, कर्तव्यनिष्ठ से व्याप्त रहे
लहराये तिरंगे की हरियाली, सदियों तक कृषक राज्य रहे.........
 

विशिष्ट विस्मृत भाव तुम्हारा, आँखों पर श्रृष्टि का भान रहे
उत्कृष्ट दृष्टांत हो ऐसे, प्रचण्ड प्रगती विमान रहे
 

उत्तफुल उन्मुक्त मानुष हो, पर परम सरलता बनी रहे,
वेदों की अपनी गरिमा हो, उत्तम अविरलता बनी रहे,
 

लहराये हरित पताका अंबर तक, उन्नति अभाज्य रहे,
लहराये तिरंगे की हरियाली, सदियों तक कृषक राज्य रहे.........
 

है त्रिलोकी हलायुध! आपदा प्रबंधन के स्वामी
हम कृषक बन्धु पर कृपा करो, है सर्वेश्वर अतंरयामी,
 

दरिद्रता क्षीरणित कर रही, ना ब्याज मिला ना आम मिला
फसलों का अवमूल्यन हो रहा, ओलावृष्टि इनाम मिला,
आत्महत्या सुलभ हो गई,ना गुटली मिली ना आम मिला,
 

विप्लव विघोष विधंस उठे, सत्यनिष्ठता शेष रहे
बह जाये द्वेष ईर्ष्यितभाव, सादरता अवशेष रहे
लहराये तिरंगे की हरियाली, सदियों तक कृषक राज्य रहे.........
 

उत्कर्ष प्रदीप्त करो सबको, खोलो उन्नति के नये द्वार
कृषक वर्ग ना शोषित हो, जन-जन हो जाए निर्विकार
 

चारु प्रपात प्रचंड बहे, ग्राम्यक हो सुखद विहार रहे
भ्रात्रभाव से पुरित हो, कोकिला का गान रहे,
 

राष्ट्रगान हो जुंवा सभी की, अर्पित तन मन धन प्राण रहे।
लहराये तिरंगे की हरियाली, सदियों तक कृषक राज्य रहे

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