मौत-एक आज़ादी

कहानी नई है ध्यान से सूनीयेगा | यूँ तो इस कहानी के प्रमुख किरदार को हम सब ने देखा है बस उनको कभी हमने वो तरजीह नही दी| देते भी क्यो? ना तो वो कोई नेता था और ना ही कोई ऐसा जिससे हम अपना काम निकलवा सके| क्‍यूँकि कहानी मैने लिखी है तू कुछ पात्र मेरे है पर यकीन मानिए देखा इसे सबने है| कहानी कुछ इस तरह है कि एक छोटा शहर है, नाम की फिकर आप ना करे| जरूरी वो शहर नही बल्कि उसी शहर मे रहने वाले एक 68 साल के बुढ्ढा है| उसका नाम था काना(अक्सर ऐसे लोगों के असली नाम कोई नही जानते और ना ही जानने की कोशिश करता है| काना के पास ना तो काम और ना ही कोई घर| ग़रीबी के हर दृश्य देख चुके काना बस अब मौत का ही इंतेज़ार कर रहे थे| बुढ़ापा किसी को ऐसे दिन दिखाए ऐसी बद्दुआ कोई किसी को ना ही दे| अक्सर लोगों की नज़र मे ऐसे लोगो सिर्फ़ समाज की उन गंदगियों की तरह होते है जो ह्मारे समाज को आधुनिक अर्थात मॉडर्न दिखने से वंचित कर देते है| काना की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जवानी के दिनो मे मज़दूरी कर गुजर बसर करने वाले इस आदमी ने जहाँ जवानी शराब को दे दी तो वही बुढ़ापा अब उसे ग़ुरबत के सिवा कुछ नही दे रहा था|
 

काना पहले शहर के पास के ही कोयला खदान से कोयला चुन कर बेचा करता था| उससे हुई कमाई से वो अपना घर चलाता था| मगर उसकी शराब की आदत ने उस ही के घर को उजाड़ दिया| उसकी बीवी घर छोड़ कर चली गयी|काना ने भी उसे नही रोका| कना को मानो अब खुली छूट थी कि अब वो आराम से बिना किसी का ताना सुने जो चाहे कर सकता था|शायद उसी आज़ादी ने आज उसे इस चौराहे पर खड़ा कर दिया था| काना का एक दोस्त हुआ करता था उसका नाम था सतबीर और वो एक स्कूल मे अध्यापक था, सतबीर से काना के तालुकात बचपन से अच्छे थे| दोनो साथ मे ही पढ़ते थे, और तो और दोनो के परिवारो मे अच्छी बनती भी थी| सतबीर ने जहाँ आगे चलके अपनी एक दुकान खोली और उसका धंधा तो अच्छा चलना ही था वही काना बस किसी तरह मज़दूरी कर अपनी जरूरते पूरी करता|सतबीर को मारे हुए काफ़ी दिन हो गये, काना को ना तो उसकी मौत से फ़र्क पड़ा और ना ही उसे कभी उसकी ज़रूरत पड़ी| काना बस अपनी बची ज़िंदगी घिस-घिस कर काट रहा था|
 

वो बाकी दिनो की तरह ही एक आम दिन थी| गर्मी का मौसम चल रहा था| सूरज की गर्मी इंसान तो क्या जानवरों तक को नही बक्श रही थी|उसी तपती धूप मे पूल के पास एक सूखे पेड़ के पास बैठा था काना| फटे क्पड़ों मे किसी तरह पेड़ की छाँव से खुद को उस झुलस्ती धूप से बचा रहा था| तभी पास से एक रिक्शावाले ने आवाज़ लगाई और काना को बुलाया| दरअसल उस रिक्शावाले से अकेले वो पूल के उपर की चढ़ाई पूरी नही हो पा रही थी इसलिए उसने उसे पीछे से धक्का देने के लिए बुलाया| उसी धूप मे काना ने नंगे पाँव , तपती सड़क पर उस रिक्शा को धकेलना शुरू किया| चढ़ाई काफ़ी ज़्यादा थी और काना उसे धकेला जा रहा था| इस उम्र मे ऐसी हालत शायद ही किसी की होती हो पर जीने के लिए कुछ तो चाहिए होता है, चाहे वो जैसे भी मिले| इसी तरह दिन भर से काना को कुछ पैसे मिल जाते थे और वो उससे और घर घर माँग कर अपना पेट पालता था|काना का अपना कोई घर नही था, उसका पुराना घर कब का उससे ले लिया गया था| अब तू बस कही भी रात कटे काना के लिए यही काफ़ी था| शायद अब इंतेज़ार भी सिर्फ़ मौत का था| दिन-ब-दिन यूही बीतते गये और काना की ज़िंदगी बस किसी ना अनसुनी रास्ते पर बढ़ी जा रही थी|
 

एक बार पास के गाँव मे मेला लगा| सारे ताम-झाम के साथ सजावट की गयी| तरह तरह के मनोरंजक खेल और चीज़े मेले मे मौजूद थे| तारा-माचीर , मौत का कुआँ, ब्रेक-डॅन्स,ड्रॅगन-ट्रेन इत्यादि| चारो तरह रंगारंग माहौल था| हज़ारो की भीड़ आई होई थी| उसी मेले मे एक जादूगर भी आया था| उसके पास तरह-तरह के हैरतअंगेज़ खेल देखाने के लिए थे| लोगों की कतारे उसे देखने के लिए थी| बचे, बूढ़े,जवान सब को वो खेल देखना था| खेल देखने का शुल्क था ५ रुपया| काना भी उस कतार मे था यह बिना जाने हुए की अंदर जाने के पैसे भी देने होंगे| उसकी जेब तू ऐसे ही खाली थी| फिर भी इतना धक्का-मुक्की मे कना ऐसे ही अंदर घुस गया और आयेज जाके बैठा| उसे सारी पुरानी यादे याद आनी लगी जब वह जवान हुआ करता था और ऐसे ही  कई जादूगरो और सर्कस के रिंगमास्टारो को देखकर बड़ा हुआ था| उसे अपनी ज़िंदगी से घर्ना होने लगी यह सोच कर कि उसने खुद को बर्बाद कर दिया और तो और खुद के परिवार को भी बर्बाद कर दिया| काना यह सब याद कर रोने लगा| तब तक  जादूगर के करतब दिखना शुरू कर दिया था| जादूगर ने जब उसे रोते देखा तो उसने उसे अपने साथ मंच पर बुला लिया और लोगो से कहा -"दोस्तो इनसे मिलिए यह है मेरे उस्ताद जिन्होने मुझे यह सारे करतब सिखाए और आज यह आप को शानदार जादू का नमूना दिखाएगे"| काना यह सुनकर डर गया उसने जादूगर से कहा-"यह तुम क्या कह रहे हो? मुझे कहाँ आता है जादू|" जादूगर ने उससे कहा-"जैसा मैं कहता हूँ वैसे करते जाओ |" जादूगर ने लोगों से कहा:"क्या आप लोग मारे हुए इंसान को फिर से ज़िंदा होते देखना चाहेंगे|" लोगों ने हाँ मे जवाब दिया| तभी जादूगर ने एआक डब्बा मँगवाया और उसमे खुद जाकर बैठ गया तभी काना ने उस डब्बे के बीच से काट दो टुकड़े कर दिए| लोग यह देखकर दंग रह गये | तभी फिर काना ने जादूगर की छड़ी घुमाई और जादूगर लोगों के बीच से निकल कर मंच पर आ गया | लोग दंग रह गये और हैरत से ताली बजाने लगे| लोगो को यकीन ही नही हो रहा था, काना के लिए लोग ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ बजाने लगे| काना यह सब देख फिर से रोने लगा, उसकी ज़िंदगी मे पहली बार ऐसा मौका आया था| काना ने जादूगर का धन्यवाद किया और वापिस लौट गया| काना की ज़िंदगी का सबसे अच्छा वक़्त उसे मिल चुका थे| अब उसे कुछ नही चाहिए था| वो उसी तरह रोज़ पुल के नीचे उस पेड़ पर बैठा रहता और उस रिक्शेवाले का इंतेज़ार करता | रिक्शा वाला भी जनता की उसकी मदद हो जाती है और बदले मे बस थोड़े से पैसे ही तू देने पड़ते है| ऐसे ही वक़्त गुज़ारता गया| एक दिन वो रिक्शा वाला गुज़र रहा था , उसके पास बहुत समान था और अकेले पुल तक चढ़ाना काफ़ी मुश्किल था| उसने नज़र दौड़ाई और काना को ढूँढने लगा , उसकी नज़र उस पेड़ के नीचे पड़ी पर आज वहाँ कोई नही था| वो निराश हो गया और खुद ही समान खिचने लगा|

दरअसल काना अब जीवित नही था| वह इस दुनिया को अलविदा कर चुका था| उसकी ज़िंदगी के सारे दर्द पूरे हो चुके थे| अब ना तू उसे उस पुल के नीचे बैठने की जरूरत थी और ना ही किसी से कुछ माँगने की| अब वो आज़ाद था, अब वो सचमुच का जादूगर था|

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