एक भारत ऐसा भी है

भारत एक ऐसा पवित्र और आनंददायक स्थान है जिसका विचार मन में आते ही सुखद अनुभूति देता है। लोगों की मान्यता है कि यहां जन्म लेने के लिए देवताओं तक में प्रतिस्पर्धा का वातावरण होता है, न जाने कितने अलंकारों से हमने इसे दुनिया को परिचित करवाया कभी सोने की चिड़िया, कभी जगतगुरु तो कभी अध्यात्म की जन्मभूमि। पूरी दुनिया हमारे इस आर्यावर्त की असीम विविधताओ के बीच इस अखंड एकता का लोहा समय-समय पर मानते आई है। हमने दुनिया को योग और आयुर्वेद दिया, विश्व का पहला आवसीय विश्वविद्यालय (नालंदा विश्वविद्यालय) देकर आश्चर्यचकित किया। लेकिन इन तथ्यों से लुटकन को कुछ लेना देना नहीं था। उसे तो यह तक नहीं मालूम था कि हमारे यहां का प्रधान कौन होता है। दरअसल इसमें उसकी कोई गलती भी नहीं है आदमी ज्ञान तभी सीखता है जब उसकी भूख शांत हो। उसकी उम्र रही होगी यही कोई 18 से 20 वर्ष जब गरीबी की मार से अपने उम्र से कहीं अधिक  का दिखता था। अपने अधूरे परिवार को पूरा करने के लिए उसके पिता नंदू ने लुटकन की शादी अपने पुराने मित्र की बेटी रूपा से करा दिया।

 

बिजली बत्ती की चकाचौंध में जहां दिन और रात में कुछ खास फर्क नहीं होता, जहां लोग एक दूसरे को गिराकर हमेशा समय से भी आगे निकलने की होड़ में भागते रहते हैं, ऐसे ही भारत के एक महानगर के रईस इलाके में नंदू का कबाड़ी का दुकान था। अपने तीसरे बच्चे को जन्म देने के कुछ महीने उपरांत ही नंदू की पत्नी का देहावसान हो गया, तब से नंदू अकेले अपने तीनों बच्चों की परवरिश किया। जब लुटकन थोड़ा बड़ा हुआ तो विद्यालय की जगह उसे अपने पिता के कारोबार में सहयोग देना पड़ा ताकि गरीबी की इस लड़ाई में उसका पिता अकेला ना हो। प्रकृति भी हमेशा संतुलन बनाती है जब कोई अट्टालिका का निर्माण होता है तो वहीं दूसरी तरफ उसी अनुपात में कई गड्ढे बनते हैं, और उन्ही गड्ढे में नंदू जैसे लोग पैदा होते हैं।

 

रूपा के आने से इस परिवार में एक अजीब ऊर्जा का प्रवाह हुआ, जैसे किसी रेगिस्तान में लंबे अरसे से बारिश का इंतजार करने वाले राही को जल की देवी मिल जाती है रूपा ने वैसा ही प्रभाव इस परिवार को दिया। सड़क के किनारे जो कल तक चार दीवारी खड़ी थी रूपा ने उसे आकर एक घर बना दिया। एक साल में ही रूपा को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। नंदू ने इस खुशी में अपने मित्रों और रिश्तेदारों को भी भागीदार बनाया और नंदू ने ही बच्चे का नाम अरमान रखा। शायद इस बच्चे में वह अपने अरमानों को जोड़ कर देख रहा था। अब लुटकन अपने बच्चे को अक्सर निहारता रहता और अपने बचपन की यादों में खो जाता। कैसे उसने अपने ख्वाहिशों को दबाकर अपने पिता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर परिवार के बोझ उठाये, कविता और कहानी याद करने वाले दिनों में उसने अपने ग्राहकों के पते को मस्तिष्क में जगह दे रखा था। गणित और विज्ञान की समस्याओं को सुलझाने की जगह वह अपने परिवार की समस्याओं में ही खुद को उलझा पाया। कंधों पर किताबों की थैलों की जगह कबाड़ी का बोझ होता था, पैर स्कूल की तरफ न जाकर पिता के साथ घर - घर पुराने सामान लाने को जाते थे। वह उन रद्दी चीजों के बीच जब पुराने खिलौनों को देखता तो उसका मन ललचता था, अपनी गरीबी को कोसता था। लेकिन उसकी भावनाएं भीषण गर्मी से तपते धरातल पर बारिश की पहली बूंदों के भाप के जैसी क्षण भर में ही धूमिल हो जाती। आसपास के कॉलोनी के बच्चे लुटकन को अपने साथ खेलने तक नहीं देते क्योंकि यह गरीब बच्चा उनके जैसी अंग्रेजी नहीं बोल पाता, उनके जैसा सुंदर नहीं दिखता, उनके जैसे कपड़े नहीं पहनता, इसलिए उनकी सोसाइटी में सेट नहीं हो पाता। क्या उसका यही गुनाह था कि वह गरीब परिवार में पैदा हुआ, गरीबी ने उसके बचपन छीन लिए। सुबह से शाम तक अपने परिवार के लिए खुद की खुशियों का गला घोट रहा था क्या यही उसका गुनाह था।

 

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जहां सबके समानता और स्वतंत्रता की बात होती है, जिसे हम दिन- रात कोशिश करके विकासशील से विकसित करने की दौड़ में लगे हैं। वही लुटकन जैसा न जाने कितना लड़का अपना बचपन दो वक्त की रोटी के लिए उथल-पुथल में गवा रहे हैं। लुटकन ने संकल्प लिया कि वह अपने बच्चे की जिंदगी वैसी नहीं होने देगा। वह अपने बच्चे की ऐसी परवरिश करना चाहता था ताकि वह मुख्यधारा से जुड़ सकें और जिस वर्ग से वह आता है उसमे एक मिशाल कायम कर सके। इसके लिए उसे जो भी कष्ट उठाने होंगे हर उस जंग के लिए तैयार था। अनायास ही नंदू के स्वर्गवास के बाद अपने दो भाइयों और अरमान के परवरिश की जिम्मेदारी रुपा के साथ मिलकर बखूबी निभा रहा था। अरमान को लटकन के छोटे भाई खेल - खेल में प्राथमिक शिक्षा देते रहते। इधर लुटकन जी जान से मेहनत करके अपने बच्चे के भविष्य के लिए पैसा संजोने लगा था। अब अरमान थोड़ा बड़ा हुआ और किसी अच्छे विद्यालय में नामांकन की बारी आई। आजकल ज्यादा से ज्यादा पैसे जमा करने की होड़ में लुटकन क्रमशः अपना स्वास्थ्य नजरअंदाज कर रहा था। ना समय पर खा पाता था और ना ही उचित आराम ले पाता था। वह सारा पैसा अपने “अरमान” के अरमान के लिए रख रहा था। खुशी - खुशी लुटकन पूरी तैयारी के साथ उस क्षेत्र के एक नामी अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय में अरमान के नामांकन के लिए गया। इंतजार की कतार में बैठे - बैठे ही लुटकन अपने बेटे के एक सुखद और स्वर्णिम भविष्य का दिवास्वप्न देखने लगा। लंबे इंतजार के बाद उसकी बारी आई और अंदर कमरे में अपनी गरीबी की मार खाई हुई झूलते शरीर के साथ अपने नौनिहाल बेटे को अंदर ले गया। इसके प्रवेश लेते ही सभी सकपका गए, सबने ऐसे देखा मानो मौन होकर ही पूछ रहें हो क्यों भाई तुम इधर कैसे, तुम लोग भी इस तरह के सपने देख लेते हो, इतनी हिम्मत कहाँ से लाते हो, ऐसे सपने तुमलोगों को देखने की आजादी किसने दी। इधर लुटकन पहली दफा इस तरह के व्यावसायिक शिक्षा के बड़े मंदिर में पदार्पण किया था, वह खुद ही बहुत दुविधा में था, किस तरह के लोग होंगे, किस तरह के सवाल होंगे, किस तरह के बात होंगे, ऐसे किसी भी चीज का उसे अंदाजा नहीं था। उसने यही सोच रखा था बस पैसे देना है और अपने बच्चे का नामांकन करवाना है। जो लुटकन अच्छे से हिंदी बोल पाने में सक्षम नहीं था उसे देखकर उस कमरे में मैडम ने उससे इंग्लिश में बात करना शुरु कर दिया। सारी बातें लुटकन के सर के ऊपर से निकल रही थी, उसे समझ नहीं आ रहा था आगे क्या बोले। बस अपनी भाषा में हाथ जोड़े उन मैडम से निवेदन कर रहा था मेरे बेटे का नामांकन कर लो बहुत मेहनत से बहुत उम्मीद से पैसे जमा करके आपके दरवाजे तक आया हूं। लुटकन इस तथ्य से अनजान था कि उस समाज में भावनाओं से ज्यादा स्टेटस मायने रखता है। अगर वह इस जाहिल अनपढ़ लुटकन के बच्चे को अपने विद्यालय में जगह देंगे तो इससे उनका मार्केट वैल्यू गिर जाएगा। अंततः मैडम ने यह कहकर लुटकन को लौटा दिया कि आपका बच्चा अभी हमारे विद्यालय में पढ़ने योग्य नहीं हुआ है। यह बात लुटकन के पैर के नीचे की जमीन खिसका दी, जैसे उसके ऊपर बिजली गिर पड़े हो, आंखों के सामने अंधेरा छा गया। आज लुटकन को वैसा ही अनुभव हुआ जैसे बड़े यत्न और मनोरथ के साथ कोई मंदिर जाए और पंडित उसे उसके भगवान से मिलने ही नहीं दे। उसे अपना जीवन अब निस्सार मालूम लगने लगा। वह दबे पांव अपने उदास दिल और टूटे अरमानों को लिए रुपा के पास जा पहुंचा, बोलने को कुछ शब्द नहीं थे बस आंखों से निकलते पानी सारी कहानी बयां कर रहे थे। काम करने की उसके अंदर की ललक भी लगभग मर सी गई। उस विद्यालय के दुत्कार ने उसके वजूद के कई टुकड़े कर दिए। शायद जीवन के इस पड़ाव में लुटकन में इतनी हिम्मत ना थी कि उन टुकड़ो को फिर से जोड़ पाता। इस सदमे ने उसके स्वास्थ्य को और भी जर्जर कर दिया। डॉक्टर से मिलने के बाद पता चला उसे सूखी टीबी हो गई है जो अंतिम पड़ाव में है। वह भी दिन आया जब अपने अनुभवी पिता से और जीवन के उतार चढ़ाव के प्रशिक्षणों से प्रशिक्षित जीवन का यह वीर योद्ध जिंदगी की जंग में हार गया और पीछे छोड़ गया एक बेबस विधवा रूपा और अपने पिता के अधूरे अरमानों के तले दबा “एक नन्हा अरमान”। यह एक कड़वी सच्चाई है लेकिन आज भी तेजी से बढ़ते इस भारत में “एक ऐसा भारत भी है”।

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