प्रेम  Deeksha Dwivedi

प्रेम

Deeksha Dwivedi

ये मोहब्बत है अपनी, कोई नादानी नहीं
ये इबादत है अपनी, जिद या मनमानी नहीं !

मीरा की भक्ति सा पावन
सिया की पीर सा सच्चा, 
प्रिय से मिलने को यूँ व्याकुल 
जैसे माँ से रोता बच्चा,
प्रेम जीवन की सच्चाई, है मिथ्या वाणी नहीं
प्रेम जिसको ना जीत पाए, कोई ऐसा प्राणी नहीं !
ये मोहब्बत है अपनी, कोई नादानी नहीं !
 

राम के धनुए सा तेजक
कान्हा की मुरली सा शीतल,
कभी सागर सा ठहरा है 
कभी झरने सा बहे कल-कल,
प्रेम रूह का संगम है, ये बहता पानी नहीं
प्रेम बिन नीरस है जीवन, कोई रुत सुहानी नहीं !
ये मोहब्बत है अपनी, कोई नादानी नहीं !


प्रेम ज्ञानी है वेदों सा
प्रेम चंदा सा सुंदर है,
प्रेम से रोशन है जीवन
प्रेम कण-कण के अंदर है,
प्रेम तो गौरव है अपना, पतन की निशानी नहीं
प्रेम शिक्षा है, दीक्षा है, बात ये बेगानी नहीं !
ये मोहब्बत है अपनी, कोई नादानी नहीं !


प्रेम की परिभाषा लिख दूँ, मैं इतनी सयानी नहीं
ढाई अक्षर की केवल, ये प्रेम कहानी नहीं !
ये मोहब्बत है अपनी, कोई नादानी नहीं
ये इबादत है अपनी, ज़िद या मनमानी नहीं !

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