क़लम तोड़ दूँ  शशांक दुबे

क़लम तोड़ दूँ

शशांक दुबे

लेखनी ही तो,अलख जगाती
कैसे भला, कलम तोड़ दूँ...
 

हालात बड़े, गंभीर हैं
कैसे धरे, अब धीर हैं
वैचारिक इस सरिता की
क्या, दिशा मोड़ दूँ?
जी चाहता है,लिखना छोड़ दूँ.....
लेखनी ही तो, अलख जगाती
कैसे भला, कलम तोड़ दूँ।।
 

दिल में छुपी, बस पीर है
आँखों में, कुछ नीर है
आत्मग्लानि से बचने
क्या ह्रदय, निचोड़ दूँ?
जी चाहता है, लिखना छोड़ दूँ.....
लेखनी ही तो, अलख जगाती
कैसे भला, कलम तोड़ दूँ।।
 

बस यही एक वरदान है
चाहे नहीं, यह निदान है
लिख-लिख कर पाठकों की
क्यों न रूह झंझोड़ दूँ?
लेखनी ही तो, अलख जगाती
कैसे भला,कलम तोड़ दूँ।

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