बस इतवार नहीं होता  शशांक दुबे

बस इतवार नहीं होता

शशांक दुबे

सब दिन होते इनके, बस इतवार नहीं होता।
 

कहने को तो होता है, समाज से जुड़ा हुआ,
पर सच बताऊँ इनका, घर-बार नहीं होता,
सब दिन होते इनके, बस इतवार नहीं होता।
 

धूल मिट्टी से सना हुआ, पसीने से तरबतर,
पैसा प्रसिद्धि चाहे हो कितनी, होता तितर-बितर।
नसीब में बच्चों का लेकिन, प्यार नहीं होता,
सब दिन होते इनके, बस इतवार नहीं होता।
 

जीवन में कर अँधेरा, जो जग में करे प्रकाश,
सपनों को लगाकर पंख, उड़ जाए जो आकाश।
इनके खुद के जीवन का, कोई सार नहीं होता,
सब दिन होते इनके, बस इतवार नहीं होता।

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