दो-धारी तलवार  Mohanjeet Kukreja

दो-धारी तलवार

Mohanjeet Kukreja

तबीयत इन दिनों बेज़ार हो चली है...
बस कि हर शै अब दुश्वार हो चली है।

बरक़रार है अब तलक शिद्दत दर्द की…
हद मगर बर्दाश्त की पार हो चली है।

खो गया कहीं वो चैन….वो सुकून…
वक़्त की ऐसी रफ़्तार हो चली है।

जज़्बात क़ीमत से अलैहदा रहें तो अच्छा
मोहब्बत तो यूँ भी कारोबार हो चली है।

ज़ख़्मों से इसके महफ़ूज़ रहें क्यूँकर…
ज़िंदगी भी दो-धारी तलवार हो चली है।
 

बेज़ार - अप्रसन्न; दुश्वार - मुश्किल; शिद्दत - तीव्रता; अलैहदा - अलग; महफ़ूज़ - सुरक्षित

अपने विचार साझा करें




1
ने पसंद किया
1041
बार देखा गया

पसंद करें


  परिचय

"मातृभाषा", हिंदी भाषा एवं हिंदी साहित्य के प्रचार प्रसार का एक लघु प्रयास है। "फॉर टुमारो ग्रुप ऑफ़ एजुकेशन एंड ट्रेनिंग" द्वारा पोषित "मातृभाषा" वेबसाइट एक अव्यवसायिक वेबसाइट है। "मातृभाषा" प्रतिभासम्पन्न बाल साहित्यकारों के लिए एक खुला मंच है जहां वो अपनी साहित्यिक प्रतिभा को सुलभता से मुखर कर सकते हैं।

  Contact Us
  Registered Office

47/202 Ballupur Chowk, GMS Road
Dehradun Uttarakhand, India - 248001.

Tel : + (91) - 7534072808
Mail : info@maatribhasha.com