तेरी जुदाई के आलम में  SANTOSH GUPTA

तेरी जुदाई के आलम में

SANTOSH GUPTA

तेरी जुदाई के आलम में डूबा ये मन है,
तू नहीं, तेरी कमी ही सही,
तेरी कमी को भी पाकर ये जीवन धन्य है।
 

तुझसे जितना प्यार है
तेरी यादों से भी उतनी ही मोहब्बत है,
दिलों की धड़कन को, बिछड़न की भी जरुरत है।
 

तेरे पास ना होने की तड़प को भी
इस कदर मैं पसंद कर लेता हूँ,
देख लेता हूँ तुझे करीब से,
आँखो को जब बंद कर लेता हूँ।
 

करीब होने का अहसास हो जाता है
जब प्रेमबल की डोर से खुदको तुझसे बाँध लेता हूँ,
रातों मे तेरी ख़ूबसूरती निहारने को चाँद देख लेता हूँ।
 

दूर रहना भी तेरा मुझे भा जाता है,
यादों से तेरी मेरे दिल को सुकून आ जाता है,
तेरी बदन की खुश्बू से खुदको महकाया था कभी,
इसलिए खुद को सूंघ लेता हूँ।
 

तू मेरे भीतर है कहीं ना कहीं,
इसलिये तुझको खुद में ढूँढ लेता हूँ,
तेरी ज़ुल्फ़ों के स्पर्श को कानों तले
याद करके मन में गुदगुदाहट को उत्पन्न कर लेता हूँ।
 

तेरी पायल की झंकार को सोचकर
तेरे आने की आहट को हृदय के स्पंदन में बदल लेता हूँ,
तेरी मधुर आवाज़ को जब सुनने का दिल करता है,
संग गाए गीतों को अकेले गुनगुना लेता हूँ,
तेरी जुदाई के ग़म में भी, खुशियाँ मना लेता हूँ।
इस अधूरेपन में भी एक सुंदर अहसास है,
दूर रहकर भी तू मेरे मन की आँखो के पास है।

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