कोई अपना  Anupama Ravindra Singh Thakur

कोई अपना

Anupama Ravindra Singh Thakur

इंसान ही जब हैवान बन कर
इंसान को सताता है,
तरक्की के नशे में अंधा बन
अपनों को ही दगा दे जाता है,
नेकी सारी भूलकर
बस फरेब का खेल रचाता है,
तब खुदा भेज देता है
किसी अपने को
मरहम उस पर लगाने को।
 

नाउम्मीदों के डूबते समंदर में
फिर उम्मीदें जब लहरा उठती हैं,
फिर अपना कोई आता है
खोई कश्ती पार लगाने को,
फिर नई आशा जगाकर
रब पर भरोसा दिलाने को,
खुदा भेज देता है
किसी अपने को
अपनों से मिलाने को।
 

अपनों के ही लफ़्ज़ों से
जब दिल हज़ार बार रोता है,
मायूसी छा जाती है
और जग सूना लगता है,
तब खुदा भेज देता है
किसी अपने को
आँसुओं को थाम लेने को।
 

शिद्दत से कोशिशों के बाद भी
जब इनाम में तोहमतें मिलती हैं,
तब ज़िन्दगी जुस्तजू बने,
सब सहूलियतें होकर भी
इमानदारी से भरोसा उठता,
मन विद्रोह करता है,
तब खुदा भेज देता है
किसी अपने को
कृष्ण बनकर गीता सुनाने को।

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