देखो हमने क्या पाया  अंकित कुमार छीपा

देखो हमने क्या पाया

अंकित कुमार छीपा

सब कस्तूरी आशाओं का है संसार धराशायी,
तुम को खोने के एवज में देखो हमने क्या पाया।
 

फिर से तेरी ढोंगी आँखों की बातों में आ जाते
जाते-जाते मुड़ जाते तो यार कभी ना जा पाते,
मन की ही तो सुनके हमने तेरा दामन थामा था
मन ही दामन छोड़ गया तो किसको दोषी ठहराते।
 

हम को तेरे पदचिन्हों पर चल कर मंजिल पानी थी
पर तेरे ही पदचिन्हों ने अक्सर हमको भटकाया,
तुम को खोने के एवज में देखो हमने क्या पाया (1)
 

साथ समय की जलधारा के बेसुध होकर बहना था
हमको इक दूजे के दिल का वासी बनकर रहना था,
अपनी कविताओं में हमने क्या-क्या बातें कह डाली
जबकि तुमसे प्रेम हमें है बस इतना ही कहना था।
 

हम तो अपनी आदत से मजबूर नहीं कुछ कह पाए
तुमने बोलो कैसे प्रियवर अपने दिल को समझाया,
तुम को खोने के एवज में देखो हमने क्या पाया (2)
 

अन-उपजाऊ आँखों में हम स्वप्नों को ना बो पाए
तेरी स्मृतियों की गोदी में भी जाकर ना सो पाए,
हमको नियमित आघातों ने इक पाषण बना डाला
तेरे मन के ताले की दूजी कुंजी ना हो पाए।
 

प्रेम कथाओं की पुस्तक में अपनी गाथा भी होती
किन्तु लिखने वाला भी आधी गाथा ही लिख पाया,
तुम को खोने के एवज में देखो हमने क्या पाया (3)

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