ज़िन्दगी  Mohanjeet Kukreja

ज़िन्दगी

Mohanjeet Kukreja

और आज वह मिल गयी I
एक होटल में बैठी थी
रोमांटिक माहौल था
मैंने कहा आओ नाचें
पर वह शायद लाचार थी I
हम एक बाग़ में आ गए
मैंने पूछा कविता सुनोगी?
वह शायद समझी ही नहीं I
कहा, अच्छा कोई बात करो
वह चुपचाप ही बैठी रही
पूछा मुझसे मिलकर उसे
कैसा लग रहा था...?!
चेहरा भावहीन ही रहा I
कोई उत्साह, कोई जवाब नहीं
मैं निराश हो चला था...
वह सिर्फ़ लंगड़ी ही नहीं,
गूंगी-बहरी भी थी शायद I
मुझे बहुत दुःख हुआ...
सोचा क़िस्मत को कोसूँ...
पर आख़िर फ़ायदा क्या था?
जो था... बस वही था...
फिर उसे छोड़ता भी कैसे?
इतनी कोशिशों के बाद तो
मिली थी 'ज़िन्दगी' मुझे.....!!

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