अब राह नहीं बदलूँगा  Abhishek Pandey

अब राह नहीं बदलूँगा

Abhishek Pandey

सूरज बरसाए निज अग्नि
या गहराती जाए अब रजनी,
अब फूल मिलें या निष्ठुर कंटक
पथ कठिन मिले या सरल अकंटक।
 

अब धूप मिले या छाँव मिले,
विजय मिले या घाव मिले,
मिले प्रशंसा या फिर दुत्कार मिले,
हर्ष मिले या प्राणों को चीत्कार मिले।
 

अब स्वेद बहे या रक्त बहे,
अश्रु बहे या हृदय दहे,
अब हार मिले या जीत मिले,
धिक्कार मिले या प्रीति मिले।
 

अब हार जीत की चाह नहीं,
बदलूँगा अब मैं राह नहीं,
मापूँगा गहरे सागर को,
गहरा है परन्तु अथाह नहीं।
 

चल दिया जिस राह पर
उसमें सतत गतिशील हूँ,
बन गया हूँ मैं नदी
अब न रहा मैं झील हूँ।

अपने विचार साझा करें




0
ने पसंद किया
114
बार देखा गया

पसंद करें


  परिचय

"मातृभाषा", हिंदी भाषा एवं हिंदी साहित्य के प्रचार प्रसार का एक लघु प्रयास है। "फॉर टुमारो ग्रुप ऑफ़ एजुकेशन एंड ट्रेनिंग" द्वारा पोषित "मातृभाषा" वेबसाइट एक अव्यवसायिक वेबसाइट है। "मातृभाषा" प्रतिभासम्पन्न बाल साहित्यकारों के लिए एक खुला मंच है जहां वो अपनी साहित्यिक प्रतिभा को सुलभता से मुखर कर सकते हैं।

  Contact Us
  Registered Office

47/202 Ballupur Chowk, GMS Road
Dehradun Uttarakhand, India - 248001.

Tel : + (91) - 7534072808
Mail : info@maatribhasha.com