अंधेरी रात का सन्नाटा  VIMAL KISHORE RANA

अंधेरी रात का सन्नाटा

VIMAL KISHORE RANA

ये अंधेरी रात का सन्नाटा
जाने क्यूँ अपना लगता है,
दिन भर में बिताया हर पल ही
जाने क्यूँ सपना लगता है।
उस शांत अंधेरे की आत्मा
मुझको जीवन सी लगती है,
यह भीड़ में भागता हुआ जीवन
मुझे कल्पना सा लगता है।
ये अंधेरी रात का सन्नाटा....
 

दिन भर कुछ परछाइयों में
ढूंढा किए हम अस्तित्व,
अरसा हुआ परखते
ढूँढ़ते हुए हमें व्यक्तित्व।
बस एक कहानी चलती है
रोज़ एक ही अध्याय आता है,
किसी बेरंग कल्पना में
मन चलता चल जाता है।
अक्सर हमें यह दिनचर्या
बस भटकना सा लगता है,
ये अंधेरी रात का सन्नाटा ……
 

चलते रहो, तुम्हें राह में
कहीं पर जीवन भी मिलेगा,
बस इसी आस का एहसास दे
हम खुद को बहला लेते हैं,
चलो कोई बेरंग सा
एक रंग और भी जान लिया,
बस इसी भ्रम को सच्चा कह
हम मंज़िल सी पा लेते हैं।
 

क्या मंज़िल थी, क्या सपने थे,
हम भूलने का प्रयास लिए,
जो राहें भी मिल जाए हमें
उन राहों का अंदाज़ लिए,
चलते-चलते अक्सर हमें
फिर से सन्नाटा दिखता है,
और फिर कुछ अपने से लम्हे
हमें अपने पास बुलाते हैं,
लगता है कुछ देर को
जाग खुल गई हो जैसे,
लगता है कुछ देर को
भाग सकतें हैं समय से,
फिर लम्हें वो छोड़ हमें
कहीं दूर निकल जाते हैं,
और फिर से जीवन को जीना
हमें पिघलना सा लगता है।
 

ये अंधेरी रात का सन्नाटा
जाने क्यूँ अपना लगता है,
दिन भर में बिताया हर पल ही
जाने क्यूँ सपना लगता है।
उस शांत अंधेरे की आत्मा
मुझको जीवन सी लगती है,
यह भीड़ में भागता हुआ जीवन
मुझे कल्पना सा लगता है।
ये अंधेरी रात का सन्नाटा...

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