चलें अब जीवन की ओर  VIMAL KISHORE RANA

चलें अब जीवन की ओर

VIMAL KISHORE RANA

विलुप्त रहता है दिल मेरा
क्यों अब तक तेरी यादों में,
जाने क्या मैंने खोज लिया
उन चंद मुलाकातों में।
इन अधूरी कुछ शामों में,
उन अधूरे कुछ ख्वाबों में,
बस कहता रहता हूँ दिल से,
चलो अब जीवन की ओर चलें।
 

बहने-बहकने की फ़ितरत,
कुछ छोड़ चला, कुछ आज भी है,
जब तक रहता हूँ भीड़ में,
मुझे जीने का अंदाज़ भी है।
आगे बढ़ जाना तो चाहूँ,
पर रह जाता हूँ ठहरा हुआ,
सब से घुल जाना तो चाहूँ,
अतीत सामने बिखरा हुआ।
इन अधूरे कुछ लम्हों में,
उन अधूरी कुछ बातों में,
बस कहता रहता हूँ दिल से,
चलो अब जीवन की ओर चलें।
 

कुछ सफलता तो पाई है,
खुद से मिलने न पाऊँ मैं,
हर शाम यह ख्याल आता है,
अब किससे मिलने जाऊँ मैं।
अब कहाँ जाकर उन बातों को
मैं एक किनारे कर जाऊँ,
अब किन राहों की ओर बढ़ूँ,
जो इन गलियों से गुज़र जाऊँ।
इन अंधेरी कुछ गलियों में,
उन अंधेरी कुछ रातों में,
बस कहता रहता हूँ दिल से,
चलो अब जीवन की ओर चलें।
 

काश कि मैं इक पंछी होता,
जो इधर चला, कभी उधर चला,
बस कुछ रंगीन फिज़ाओं में,
हर लम्हा जाता गुज़र चला,
कभी इस ओर, कभी उस ओर,
मैं अक्सर ढूँढ़ा करता हूँ,
जीने का सहारा मिल जाए,
जीवन को ढूँढ़ा करता हूँ,
यह गमगीन शामें, और ये काली परछाइयाँ,
हम अक्सर भागा किए, फिर से मिल गयी तनहाइयाँ……
हम अक्सर भागा किए, फिर से मिल गयी तनहाइयाँ……

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