वेदना गीत  अंकित कुमार छीपा

वेदना गीत

अंकित कुमार छीपा

वेदना में, वेदना की वन्दना गाते रहेंगे,
आँख में आँसू छिपाए रोज़ मुस्काते रहेंगे।
 

हम हृदय में नित नये स्वप्नों का संचय कर रहे थे,
मूर्ख ही थे जो स्वयं को मुफ्त में क्षय कर रहे थे,
प्रेम करना एक गुण है सहृदयता से भरा, पर
लोग तो हर क्षण हमारे साथ अभिनय कर रहे थे।
 

किंतु फिर भी प्रेम के आगे विवश होकर निरन्तर,
झूठ को सच मानकर हम खुद को भरमाते रहेंगे,
आँख में आँसू छिपाए रोज़ मुस्काते रहेंगे।
 

टूट कर बिछड़ी पतंगों की कोई गलती नहीं थी,
कागज़ी रेशों बनी उस डोर में ही कुछ कमी थी,
प्रेम अपना हम निछावर कर रहे थे उस हृदय पर,
जिस हृदय में प्रेम लौटाने की क्षमता ही नहीं थी।
 

हम प्रतिदिन वक्ष पर अन्याय का यह बोझ ढोए,
न्याय को अन्याय के दरबार में आते रहेंगें,
आँख में आँसू छिपाए रोज़ मुस्काते रहेंगे।
 

जानकर भी इक त्रुटि हर बार दोहराते रहे हम,
आँधियों से इक पुरानी नाव टकराते रहे हम,
द्वार कि जिसपर महाविपदा लिखी तख्ती लगी थी,
आस में अनुराग की वह द्वार खटकाते रहे हम।
 

सीख लेनी चाहिए थी अपनी त्रुटियों से हमें, पर
हम तो अपनी मूर्खता पर नित्य इठलाते रहेंगे
आँख में आँसू छिपाए रोज़ मुस्काते रहेंगे।

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