भय  सलिल सरोज

भय

सलिल सरोज

भय का रोज़-रोज़ कृत्रिम बाज़ार बनाया जाता है,
धूप, चादर और कंदील से भरपूर सजाया जाता है,
भगवान, खुदा, इशु को बहलाया-फुसलाया जाता है,
और फिर मूर्ख इंसान को उस से ही डराया जाता है।
 

भय का साम्राज्य पाषाण काल से जारी है,
बल, विवेक, बुद्धि सब पर ही यह भारी है,
समाज को हिस्सों में बाँटने की तैयारी है,
यह बौद्धिक समाज की सबसे बड़ी बीमारी है।
 

स्त्रियों को सामाजिक रीति-प्रथा से दबाया जाता है,
जो विरोध करे, उसे कुल्टा-डायन बुलाया जाता है,
पुरुष निर्मित समाज का नियम समझाया जाता है,
जिसमें भय, आक्रांत और दंड को मिलाया जाता है।
 

बच्चों को आदर्श और नैतिकता का पाठ पढ़ाया जाता है,
सड़े-गले, अनर्गल प्रबंधों को प्रश्न करने से कतराया जाता है,
रूढ़िवादिता और अव्यवहारिकता ने खूब मनाया जाता है,
और नेपथ्य से नव-निर्मित पुरुष का पर्दा उठाया जाता है।
 

सारे सरकारी तंत्रों के निर्माण का भय ही तो आधार है,
भय-दहशत की कालाबाज़ारी ही एक मात्र रोज़गार है,
गलतियाँ यूँ छिपाने में यह महकमा बहुत समझदार है,
शासित, शासक से डरकर रहे, यही गणतंत्र की बयार है।
 

भय सिर्फ झूठ के माध्यम ने नहीं उगाया जाता है,
सच को दबा-कुचल कर भी इसे फैलाया जाता है,
शिक्षा, दीक्षा, परीक्षा से फलाया-फुलाया जाता है,
भय के दरबार में बौद्धिकता को रुलाया जाता है।
 

मनुष्य प्रेम से ज्यादा, भय के कारण साथ होता है,
भय का स्वीकार्य ही चरणामृत और प्रसाद होता है,
भय की अनुपस्थिति से ही सब वाद-विवाद होता है,
भय न रहे मन में क्षण भर, तो सब बर्बाद होता है।
 

प्रत्येक मनुष्य को अन्य मनुष्य का शासक होना है,
भय के रथ पर सवार निरंकुश दुःशासक होना है,
संसार की नियति, मान-मर्यादा का नाशक होना है,
स्वर्ग सी ज़मीन पर दोज़ख का प्रशासक होना है।
 

भय किसी जीत का नहीं, निरीहता का प्रतीक है,
जो किसी को डराता नहीं बस केवल वही ठीक है,
भय से मिली जीत, पराजितों से मिली हुई भीख है,
भयभीत करना और होना दोनों छिन्न मस्तिष्क है।
 

भय की विरासत पर उल्लास की खेती असमंभव है,
भय के सान्निध्य में मनुष्य को मिलता बस पराभव है,
भय को मिटाकर स्नेह से सब जीतना दुष्कर कब है?
भय कृत्रिम पोशाक और प्रेम मनुष्यता का जेवर है।

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