प्रकृति से संघर्ष  SIDDHARTHA SHUKLA

प्रकृति से संघर्ष

कहानी में मनुष्य का प्रकृति से संघर्ष और सतत प्रयासरत रहने की इच्छा तथा जिजीविषा को दिखाया गया है

घाट, बनारस के घाट। यहाँ दो तरह के लोग सुकून की तलाश में आते हैं - एक जो मरने वाले हैं और एक हम हॉस्टल वाले; उन्हें मोक्ष चाहिये और हमें मस्ती। ना जाने कितनी कहानियाँ, विचार इन्हीं घाटों पर बैठकर आते हैं और फिर गंगा की धारा पर दीपमाला जैसे बह जाते हैं। हमेशा की तरह मैं घाट पर बैठा हुआ हूँ। सोचता हूँ, कुछ लिखूँ। पर क्या? ठंड में सितारे कंपकंपा रहे हैं और चाँद सिकुड़ कर छोटा सा रह गया है। रात अकेले इतनी ठंड में क्या कर रही है? शायद अपने दिन का इंतज़ार। इनका प्यार सच्चा है, मैं मन ही मन हँसा। अचानक एक ठंडी हवा का झोंका आया, एक अहसास जिस्म से होता हुआ रूह तक उतरा और भीतर तक कंपा गया। इश्क और ठंड दो ही अहसास ऐसे हैं जो जिस्म के ज़रिए रूह तक उतरने की ताकत रखते हैं। इस हवा के झोंके के साथ एक और चीज़ आई - किसी बूढ़े के खाँसने की आवाज़।

मैंने ध्यान से देखा तो थोड़ा नीचे की सीढ़ियों पर एक बूढ़ा आदमी सो रहा था। पाँवों को छन्दबद्ध तरीके से पेट में घुसा लिया था और उपर से नीचे तक एक अतुकांत कविता हो चुका था। हवा पत्थरों का सीना चीर कर, अपनी अदाओं पर इतराती हुई, तेज़ी से चलने लगी थी। उसके पैरों के पास एक कुत्ता बैठा कूँ-कूँ कर रहा था। बढ़ती हुई ठंड के साथ बूढ़ी साँसे घट रहीं हैं। उसका शरीर काँप रहा है? नहीं ये विद्रोह है। विद्रोह साँसों की गर्मी का जो खून को जमने नहीं देना चाहती। ज़िन्दगी और मौत के बीच का अंतर महज़ उतना पतला है जितना कि उसके ऊपर पड़ा टाट का बोरा। फेफड़ों में जमे बलगम की वजह से उसकी साँसों से आवाज़ आ रही थी मानो शीत के विरुद्ध ‘शीत युद्ध’ छोड़कर, बूढ़ा जंगी बिगुल फूँक रहा हो। टाट का बख्तरबंद पहने, साँसों से बिगुल फूँकता हुआ वो अकेला बूढ़ा सर्द हवाओं से युद्ध को तैयार था।

तभी अचानक कुत्ता उठा और उसके उपर से टाट हटाने की कोशिश करने लगा। पहले तो उसने आनाकानी की फिर बूढ़ा उठा, बड़े धीमे-धीमे कुछ बड़बड़ा रहा था। उठकर अचानक कहीं चल दिया। टाट के बोरे से तन को छिपाता हुआ वह चल पड़ा, उसके पीछे-पीछे कुत्ता भी चल पड़ा। पड़ोस में ही हरिश्चंद्र घाट है। हाँ, वही जहाँ लाशें जलाई जाती हैं। धीरे-धीरे दोनों का आकार छोटा होता दिखने लगा, पर अभी भी वो मेरी देखने की सीमा में थे। एक सुलगती हुई चिता से उसने कुछ लकड़ियाँ उठाई और वहीं पर इकठ्ठा करके उन्हें जलाने लगा। मुझे लगा आज शायद हरिश्चंद्र घाट पर ठंड की भी चिता जलेगी। मैं उन दोनों की कूटनीति समझता था। ज़रूर ये दोनों आज ठंड की चिता जलाने की सोच रहे होंगे, यहाँ जलकर ठंड को भी मोक्ष मिल जाएगा और फिर ठंड कभी नहीं आएगी। हारा हुआ इंसान क्या-क्या नहीं सोचता?

इंसानीनुमा आकृति के मुँह से उठता लच्छेदार धुआँ बता रहा था बूढ़े ने चिलम जलाई है। ठंड ही नहीं दुनिया की हर समस्या का इलाज़ है ये। पर ठंड तो शरीर में लगती है दिमाग में नहीं। सो चिलम भी कब तक साथ देती? बैठे-बैठे आधे घंटे में उसने शायद तीन चिलम फूँक लीं, या शायद दो। क्या होगा इसका अगर ये मर गया तो कोई इसी के उपर कुछ लकड़ियाँ रखकर आग लगा देगा? कविता, ग़ज़ल, प्रेम, शिक्षा, सरकार, अफसर, मशीनें, धर्म ये सब क्या दे सके इस बूढ़े को? अख़बार के 'अपना शहर' वाले पृष्ठ पर एक छोटे कॉलम में लिखा होगा―'घाट पर ठंड की वजह से एक वृद्ध की मौत'। मुझे लग रहा था यह कुदरत के ज़ुल्मों की इन्तेहाँ है शायद। पर नहीं मैं गलत था।

अचानक से हल्की बारिश होने लगी। चिताओं की आग भी बुझ गई। कुत्ता और बूढ़ा तेज़ी से इस घाट की ओर वापिस आने लगे। मानो प्रकृति उस बूढ़ी जान की जिजीविषा को हराने पर तुली हुई थी। ईमानदारी से बोलूँ तो मैं अंदर ही अंदर खुद को धिक्कार रहा था। क्या मुझे अपना स्वेटर उसको दे देना चाहिए? पर फिर मैं क्या करूँगा इस बारिश और ठण्ड में? ऊपर से ये हवाएँ जैसे ठंड से हार जाने के बाद ताने मार रहीं हों। वो बूढ़ा और कुत्ता जल्दी से आए और घाट पर एक पण्डे की बांस की छतरी के नीचे सिकुड़ कर बैठ गये। ऐसा लग रहा था मानो इस बारिश के बाद वो बूढ़ा कर्ण की तरह अर्जुन रुपी ठंड से गुहार कर रहा हो कि मुझे सम्भलने का मौका तो दो। पर ठंड उसको हराने में ही अपना धर्म समझ रही थी। और इधर मेरे अंदर की इंसानियत इतनी ठंड में शायद शीतनिद्रा में चली गई। मैं वहाँ से जाना चाहता था, पर उस बूढ़े के संघर्ष को किसी सस्पेंस मूवी की तरह देखना चाहता था। क्या काशी बाबा जम गए हैं? शिव तुम इतने निष्ठुर? एक पन्द्रह-सोलह साल का एक लड़का कम्बल ओढ़े हुये कहीं से आया और उस छतरी के नीचे चिलम फूँक रहे बूढ़े के पास आकर बैठ गया। बूढ़े को ठिठुरते देख लड़के ने उसे कम्बल में आने का इशारा किया। बूढ़े ने अपना टाट का बोरा कुत्ते के ऊपर डाल दिया और कम्बल में आ गया। लड़के ने बदले में उसके हाथ से चिलम ले ली और थोड़ा धुआँ उड़ा दिया। जैसे प्रकृति से चेतावनी दे रहा हो कि तुम्हारे हर वार को यूँ ही धुएँ में उड़ा दिया जाएगा। प्रकृति के विरुद्ध उनके इस संघर्ष को देख मैं पानी-पानी हो चुका था। मैंने अपना स्वेटर उतारा और उस बच्चे को दे दिया। जाते-जाते मैंने देखा बच्चा स्वेटर पहने बैठा था। बूढ़ा कम्बल और कुत्ता टाट का बोरा ओढ़कर सो गए। प्रकृति-इंसानी संघर्ष और मौत-ज़िंदगी के आगे नतमस्तक थे।

अब प्रकृति से संघर्ष की बारी मेरी थी।

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