मोची  Sameer Rishi

मोची

प्रस्तुत कहानी "मोची" लेखक के साथ घटे वास्तविक प्रसंग का शाब्दिक रूपांतरण है। इस कहानी के माध्यम से लेेखक एक इंसान की सहनशक्ति व स्वाभिमान को प्रदर्शित करना चाहता है और साथ ही इस बात पर भी समाज का ध्यान ले जाना चाहता हैै कि हम प्रतिदिन ऐसे कई व्यक्ति देखते हैं जो कठिनतम परिस्थितियों में भी भीख नहीं माँगते और इस मोची की तरह अपने स्वाभिमान की अलख जगाए रखते हैं।

ऊषा की झीनी लालिमा पूर्व दिशा में आलोकित होने लगी थी। बाहर ठंडी-ठंडी बयार भी बह उठी थी, मैंने उनींदी आँखे मींचते हुए कमरे के बाहर कदम रखे। चप्पलें पहन कर चलने को हुआ ही कि -"अरे ये क्या, यह भी अभी ही टूटनी थी"

गुस्से में एक बार सोचा कि उठाकर बाहर फेंक आऊँ (फ़िर नई ले लूँगा), जैसा कि करता आया था। फिर अनायास ही मन में एक रेखाकृति स्वतः उभर आई। एक अनजान व्यक्ति का जाना-पहचाना सा चेहरा मानस-पटल पर अपना धुंधला स्वरुप प्रस्फुटित कर रहा था। मन में एक कौतूहल-सा उत्पन्न हुआ, "वो मोची! ...वही जो चायवाले ठेले के पास गुलमोहर के पेड़ के नीचे बैठता है।"

मैंने कुछ सोचकर टूटी चप्पलें एक थैले में डालीं और उन्हें लेकर उस अनजान चेहरे के पास चल दिया।
गंतव्य पर पहुँचने के बाद मैं रुका, चायवाले से एक चाय ली, उसके बाद मैं उधर मुख़ातिब हुआ जिधर वह मोची बैठता था।

"अधेड़ उम्र, धूसर कमीज़, पैबन्द लगी हुई पतलून पहने वह व्यक्ति मुझे बहुत गूढ़ व्यक्तित्व का लगा।" बगल में रखे हुए पुराने टीन के बक्से में से वह अपने काम के ज़रूरी सामान और औज़ार निकालकर
ज़मीन पर बिछा रहा था। कुछ दो-तीन जोड़ी जूते भी निकाले रखे हुए थे, जिन्हें शायद कोई पहले आकर पॉलिश करने के लिए दे गया था, चुनांचे वह पॉलिश की डिब्बी खोलकर ब्रश रगड़ने में लीन हो गया। मैं कुछ देर से एकटक उसे अपने कार्य में तल्लीन हुआ देख रहा था, तभी उसकी आवाज़ से मेरा ध्यान भंग हुआ - "क्या काम है बाबू?" उसने सौम्य तरीके से मुझसे पूछा, लेकिन उसका व्यक्तित्व अभी भी गंभीरता को समाहित किए हुए था। "ये चप्पलें टूट गई हैं इन्हें सही करवाना है दादा", मैंने थैले से चप्पलें निकालते हुए कहा। उसने मुझसे चप्पलें लीं और एक ओर रखकर फिर अपने काम में लीन हो गया।

मैं कुछ क्षण उसे काम करते देखता रहा, "आप क्या इसी शहर के हैं दादा?" मैंने चाय पीते हुए पूछा। वह कुछ क्षण शांत रहा फिर बोला - "नहीं बाबू हम तो बस यहाँ काम-धंधा करते हैं, पैदाइश और जो भी कुछ जान-पहचान है वो सब गाँव में है" उसने कहा।

"तो आप कितने बरसों से यह काम कर रहे हैं?" मैंने पूछा।
"यही 6-7 बरस तो हो गए होंगे" उसने काम में लीं रहते हुए उत्तर दिया।
"अच्छा आपकी उम्र 56-57 बरस तो होगी ही!" मैंने जिज्ञासावश कहा।
उसने कोई उत्तर न दिया, मैंने कुछ क्षण बाद फिर पूछा - "आपकी उम्र"
"60 बरस का हो चुका हूँ बाबू", शांत भाव से उसने उत्तर दिया।
"तो आपका परिवार... !!", मैंने अधूरा प्रश्न किया।
उसने कोई जवाब न दिया कुछ देर तक सन्नाटा ही छाया रहा।
मैंने फिर पूछा - "आपके बेटे/बेटियाँ तो होंगे ही!"

मोची ने एक क्षण को मुझे देखा फिर शून्य में कहीं खो गया, एक क्षण को सन्नाटा रहा, मैंने फिर हल्के स्वर में पूछा - "आपके बेटे... बेटियाँ ... कोई तो?" अधेड़ मोची का शून्यत्व भंग हुआ।

"बिटिया की तो शादी कर दी थी, जो कुछ थोड़ी जमीन थी, सब बिटिया की शादी-ब्याह के कामकाज में लग गई। दहेज में मोटरगाड़ी माँग रहे थे उधरवाले, तो उसका भी इंतजाम किए। खून-पसीना एक कर दिए लेकिन सब इंतजाम कर दिया। मेरी धर्मपत्नी भी बिटिया की शादी के कुछ बरसों बाद लाइलाज बीमारी से खतम हो गई। धीरे-धीरे बिटिया के ससुरालवालों ने भी उस पर पाबंदियाँ लगा दीं, उसे घर से भी नहीं निकलने देते, हमारे पास तो कुछ बचा नहीं था, तो नाते-रिश्तेदारो ने भी मतलब तोड़ लिया।"

"और आपके बेटे!", मैंने विस्मित स्वर में पूछा।
"दो बेटे हैं वहीं गाँव में, बड़े बेटे ने तो शादी के बाद हाथ खड़े कर लिए, अपनी पत्नी के साथ अलग घर परिवार बसा लिया, बोलता था - तूने किया ही क्या है मेरे लिए।"
"और आपका दूसरा बेटा!", मैंने सहानुभूति के लहजे में पूछा।
"दूसरा बेटा तो तुम्हारी उम्र का ही होगा बाबू, कोई 23 बरस का", उसने कहा।
"तो वह...!", मुझे पूछते हुए अब ग्लानि सी हो रही थी।
"उससे तो बहुत कहे कि पढ़ाई-लिखाई कर लो तो कुछ काम चल सकेगा, लेकिन वह अपनी जुआ-शराब की लत में ही बर्बाद हो गया। हमें गाली-गलौज करके जुआ खेलने और शराब के पैसे माँगता था। कई बार तो गाँव में लोगों के सामने हंगामा कर हमें बेइज्जत किया। फिर एक रात हम बिना किसी को कुछ बताए बिना किसी से मिले गाँव छोड़ दिए। सोचे अब तो कुछ बचा नहीं, तो औलाद की ज़लालत बर्दाश्त करने से तो अच्छा है कि बाक़ी बची हुई ज़िंदगी ऐसे ही कोई काम करके भगवान के सहारे काट लूंगा। शहर चला आया, यहाँ तो किसी से जान पहचान न थी, पापी पेट की भूख मिटाने को यह काम करने लगा", कहते-कहते उस "अधेड़ व्यक्ति" का गला रूंध आया।

मैं निःशब्द खड़ा रहा, अंतरतम तक भावनाओं के सारे तार हिल चुके थे। मन में अवस्थित निर्वात भावपूर्ण अश्रुओं से सराबोर हो चुका था। मैंने अब और कुछ पूछना उचित न समझा।

"बाबू ये लो तुम्हारी चप्पलें सही से गाँठ दी हैं अब जल्दी न टूटेंगी।" उन्होंने चप्पलें मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा। मैंने उनसे अपनी चप्पले लेकर थैले में डाली। फिर जेब में हाथ डालते हुए बोला -
"कितने रूपए हुए दादा?"
"बीस रूपए हुए बाबू।"
मैंने सौ रूपए का नोट निकाला और उनकी ओर बढ़ा दिया।
"बाबू अभी सुबह बहुनी भी नहीं हुई है, छुट्टा रूपए तो हैं नहीं।"
"आप रख लीजिए, बाबू कहे हैं तो अपना ही समझकर रख लीजिए। चप्पले बनवाने फिर आता रहूँगा।"
उस "अधेड़ व्यक्ति" ने मेरे रूपए लौटाने की पुरजोर कोशिश की, कहा कि बाद में जब छुट्टे हों तब दे देना। लेकिन जब मैंने आग्रह किया तब उसने वो रूपए रख लिए।
"भगवान भला करे बाबू! आज के वक़्त हम गरीबों को कौन पूछता है, तुमने बहुनी में इतने रूपए दे दिए। भगवान करे तुम खुश रहो आगे बढ़ो अपने माँ-बाप का नाम रोशन करो", उन्होंने हृदय के अंतरतम से मुझे आशीष वचन कहे।

मैंने उनका अभिवादन किया और फिर बिना मुड़े अपने कमरे की राह पर चल दिया। रास्ते में अंतर्मन में यह उलझन चल रही थी कि और कितने होंगे हमारे वृहद् देश में ऐसे - "मोची!"

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