वैश्यालय  Rushi Rajendrabhai Bhatt

वैश्यालय

ये कहानी उस जगह पर आकार लेती है जिस जगह का नाम सभ्य समाज में बड़ी ही बेरुखी से लिया जाता है। कोई इसे वैश्या बाज़ार कहता है तो कोई तवायफ खाना। लेकिन मैंने जान बूझकर इस कहानी को वैश्यालय कहा हैं क्योंकि हिंदी में आलय का मतलब होता है घर और घर वो जगह होती है जहाँ हम आज़ाद होते हैं और अपनी मनमानी कर सकते हैं, लेकिन वैश्याओं के घर में उन्हें अपनी मनमानी या आज़ाद तरीके से जीने का हक नहीं होता और न ही किसी से प्यार करने का। लेकिन इस कहानी में वैश्यालय में मोहब्बत पनपती है और इश्क़ का धुआँ उठता है। एक लड़का एक तवायफ के दिल में मोहब्बत का मल्हार छेड़ कर जाता है। मोहब्बत के इस राग को मैंने अपने तरीके से बयाँ करने की कोशिश की है, उम्मीद है आपको पसंद आएगी।

ढूँढ रही हूँ मैं उसको
उन चद्दर की सिलवटों में,
प्रेमाधीन हुए जोड़ों के बोसो में,
लबों पर टपकती हुई बारिश की बूंदों में,
वैश्यालयों के विषादो में,
सभ्य समाज की गालियों में,
मेरी पीठ पर पड़े हुए छालों में,
गालों की गुलाबियत में,
आइनों की वास्तविकताओ में,
उसे ढूँढती हूँ जो छेड़ गया था,
इस सदियों से तार-तार होती हुई रूह में
महोब्बत का संगीत!
वीभत्स रागों की बंजर भूमि पर
जिसने मल्हार गाया था
उसको ढूँढ रही हूँ।
लेकिन वो कहीं नहीं है
कही भी नहीं है
सिवाय मेरी रूह के!

वो सीन पिछले एक घंटें में ४०वीं बार रिवाइंड पर चल रहा था। अजीब सी खुशी महसूस हो रही थी उसे वो सीन देख के। आज सुबह जब वो अपने बिस्तर से करवटें लेकर उठी तब उसे ऐसा लग रहा था मानो सूरज की किरणें जो खिड़की से दस्तक दे रही थीं, वो भी चाँद जैसी कोमल लग रही थीं। उठकर उसने सूरज की किरणों के सामने अपना मुँह रखा, सामने छत पर बैठा हुआ आदमी हल्का सा मुस्कुराया और मन में ही बोला ‘हुह, वैश्या कहीं की!’ जिन रास्तों को वैश्यालयों का रास्ता कहा जाता था उस रास्ते पर रहने वाला वो आदमी, जिसकी हर शाम किसी औरत के बिस्तर को खून से भर देती थी और अपनी हवस से औरत के बदन को तार-तार कर देता था, वो आदमी उस औरत को वैश्या कहकर गाली दे रहा था!

सूरज की किरणें उस औरत के लबों को चमक दे रही थीं, ऐसी चमक जो सोने में होती है। विज्ञान के असंभव आविष्कारों एक किसी पदार्थ का उर्जा स्तर बढ़ाने या घटाने पर उस पदार्थ का पूरा स्वभाव बदल जाता हैं, उसे माना जाता है कि जहाँ तक विज्ञान अभी पहुच नहीं पाया है। उस औरत के लब सूरज की किरणों की वजह से ऐसे चमक रहे थे मानो अगर कोई पुरुष उस पर अपने होंठ रख दे, तो वो चमक सोने से बदल कर हीरे में तब्दील हो जाएगी! विज्ञान जो कि सिर्फ तत्वों पर प्रयोग करता हैं, कभी किसी औरत की रूह में भी उतरकर देखे तो उसे प्रकृति के सारे अविष्कार मिल जाएँगे।

बहरहाल, उस औरत ने खिड़की से ही नीचे खड़े हुए चायवाले को आवाज़ दी। सामने बैठे हुए आदमी के जेहन में हल्की सी सिसक दौड़ गई और बोल उठा कि हम में कौन सी कमी है जो आज इस टुच्चे चायवाले से हमबिस्तर होना चाहती है ये औरत! सफल आदमियों को हर वक्त जीतने के लिए अहंकार ज़रूरी होता है और समाज उस अहंकार को तर्क की दीवारों से पटक कर लाज़मी भी बताता है लेकिन असफल आदमी को अहंकार इस लिए ज़रूरी होता है ताकि वो जी सके! इतनी विफलताओ के बावजूद उसे ये महसूस करना होता है कि समाज में हम से भी अधिक पापी और बर्बाद लोग हैं। ये छत पर बैठा हुआ आदमी जो हर रोज़ अपनी विफलताओं को किसी वैश्या के बिस्तर पर बहा देता था, जो चंद पैसे देकर अपनी हवस को और अहंकार को बुझाता था, वो आदमी अपना पेट पालने के लिए इस धंधे में आई औरतों को गालियाँ दे रहा था! औरत की आवाज़ सुनकर चायवाले के मन में सभी केमिकल्स एक साथ दौड़ने लगे। उसे लगा कि आज पैसे नहीं देने पड़ेंगे! वो मानवसहज स्वभाव के वश में आकर अपने बाल अच्छे से कंगी करके, मुँह पर २००-३०० ग्राम पावडर लगा के, शर्ट पर गुलमोहर वाला इत्र लगा के और शर्ट के २ बटन खुल्ले छोड़कर सीढ़ियाँ चढ़ गया और दरवाजा खटखटाने लगा।औरत ने दरवाजा खोला और तभी उसे देखकर चायवाले के दिमाग में एड्रेनलिन की मात्रा बढ़ने लगी और डोपामाइन दौड़ने लगा। कामदेव का काम तब आसान हो जाता है जब वो अपना तीर समाज के निचले तबके के लोगों पर चला रहा होता हैं क्योंकि उस तबके के लोगों के पास खुश रहने के लिए और और कोई चीज़ होती ही नहीं है। इसलिए अक्सर देखा गया है कि झोपड़ियों में रहने वाले दम्पति हम दो हमारे दो में यकीन नहीं रखते।

उसने जब दरवाजा खोला तब चायवाले के मन में वो किसी मेनका से कम नहीं थी, हालाँकि वो खुद कोई ऋषि नहीं था और यही फर्क था! बिखरे हुए बाल पृष्ठ भाग को छू रहे थे और हाथों में सफ़ेद रंग का फूल रख के उसे सूंघ रही थी। सफेद रंग, जो की शांति का रंग कहा जाता है, वो वैश्यालयों के स्वभावगत चहलपहल से विपरीत था! उसने लाल रंग की साड़ी पहनी हुई थी, जो कि पहले से उन्मत करने वाला रंग था, होठों का निचला हिस्सा दातों से दबाए रखा था और यही एक अदा औरतों की होती हैं जिसके सामने सख्ती के देवता भी पिघल जाएँ! चायवाले के मन में बवंडर उठ चुका था काम का, शायद कितनी बार हमबिस्तर होने के बावजूद हर बार ये औरत उस चायवाले को आज नई लग रही थी। शायद चायवाले के मन में इश्क की आँधी चलने की शुरुआत हो चुकी हो, क्या पता! आमतौर पर लोगों की नज़र सबसे पहले वैश्याओं के उरोजों पर पड़ती है लेकिन इस चायवाले की नज़र उस औरत की मादक आँखों और लबों पर ही टिकी हुई थी। वो पी रहा था आँखों से जाम और जूझ रहा था रसिकता और हवस के बीच!

उस औरत ने उसे अंदर बुलाया, उसके मन में वो चायवाला एक कस्टमर से ज्यादा कुछ भी नहीं था। लेकिन आज वो एक दोस्त की तरह कुछ माँगने जा रही थी। कुछ समय तक आँख से आँख लड़ाते रहने के बाद आखिर में खामोशी टूटी। औरत बहुत ज्यादा धीरे से बोली की पिछली बार जब हम हमबिस्तर हुए तब मैंने कहा था कि अगले हफ्ते से मेरे पीरियड्स शुरू होंगे और तब समय बिताने को कुछ न होगा। तब तूने कहा था कहा था कि मेरे पास धार्मिक सीरियल का खजाना है, पूरा वो मैं तुझे दूंगा, अभी हैं वो तेरे पास!?

ये सुनके चायवाले के चेहरे के भाव पलटने लगे! पूरी लहर किनारे से टकराकर जैसे अपने स्थान पर पहुँच जाती है वैसा ही कुछ उसके साथ हुआ! क्या सोच रखा था और क्या होगा इसका अफ़सोस मानते हुए उसने शर्ट के दोनो बटन बंद कर दिए और जवाब न देने की अदा में सिर्फ "हाँ" कहा। वो औरत फिर से बहुत धीरे से बोली कि मुझे वो चाहिए! धीरे से इसलिए बोली ताकी कोई सुन न ले, क्योंकि वैश्यालयों में वैश्या धार्मिक नहीं हो सकती! धार्मिक होने से उसका जमीर जाग जाएगा और फिर वो किसी के साथ हमबिस्तर तो होगी लेकिन अपने कस्टमर को लुभा न पाएगी! इसीलिए वैश्यालयों की मुखिया ऐसी कोई भी धार्मिक सामग्री नहीं रखती कि जिससे वैश्याओं को लगे कि इस दुनिया में और भी रंग होते हैं, सिर्फ यकरंगी दुनिया नहीं होती! इसलिए वैश्यालयों में धार्मिक होने का मतलब वैश्यालयों के नियमों से विद्रोह करना होता है!

चायवाले ने अपने मोबाईल से पूरी सीरियल दे दी और बड़ी चालाकी से उस के बीच में वो ३-४ फिल्में भी दे दी जो अक्सर सभ्य समाज के लोग दरवाजा बंद करके और कानों में हेडफोन लगाकर देखते हैं! वो सब दे कर चायवाला नीचे उतरने लगा और गली दिए जा रहा था कि खालीपीली अपुन ठेका छोड़ के इस रंडी के बुलाने पे आया। ये साली रंडियाँ किसी की सगी नहीं होती! चायवाले को इतनी जल्दी बाहर आते देख सामने छत पर बैठे आदमी ने वहाँ से ही आवाज लगाई की क्या हुआ बे? देखते ही निकल गया? और ये बोलकर वो ज़ोरों से हँसने लगा। चायवाला उसकी बात अनसुनी करके और औरत को गालियाँ दे कर अपने काम पर लग गया।

उस औरत ने दरवाजा बंद किया और कानों में हेडफोन डालकर मोबाईल में वो सीरियल शुरू कर दी। उसे पूरी सीरियल में कोई दिलचस्पी नहीं थी, उसे तो बस वो एक सीन देखना था! उसने जल्दी से सीरियल को फ़ास्ट फॉरवर्ड किया और वहाँ आकर स्टॉप किया जब कृष्ण का पहली बार मथुरा में आगमन होता है। वो बड़ी रूचि से वो सीन देख रही थी जब मथुरा के लोग कृष्ण और बलराम को अजीब आकर्षण से देख रहे थे और कृष्ण का काले होने की वजह से मजाक उड़ा रहे थे। तभी रस्ते के दूसरी ओर से कुब्जा का आगमन होता है, हाथों में चन्दन लिए वो कंस की दासी कंस को लेप लगाने के लिए जा रही थी और सामने ये दो भाई मिले। एक लम्बा और चौड़े बदन वाला था कि जिसके सामने उस रस्ते की सभी औरते देख रही थी और कुछ औरतें मन में ही उससे अपना कौमार्य भंग करने की सोच रही थी और कुछ औरतें मन ही मन उस परम अवस्था को पा रही थी जो आजतक हमसफ़र से हम-बिस्तर होने के बाद भी न मिली थी।

लेकिन कुब्जा का ध्यान उस बालक पर था जिसके बारे में सिर्फ आजतक बातें ही सुनी थी। वो हर बार उस १४ साल के लड़के को तसव्वुर में भोगती थी जिस लड़के की रासलीला का आजतक सिर्फ वर्णन सुनने को मिला था! लेकिन वो समझती थी कि उस लड़के के अधरों तक पहुँचने के लिए उस लड़के की बाँसुरी की तरह ही अपनी चेतना में कई सारे छेद करने होंगे, तभी निकलेगा वो संगीत जिसे सुनकर पूरी गोकुल की प्रकृति झूम उठती थी। वो मथुरा में रहकर भी गोकुल की अवस्था को चूमती थी, रंज होता था उसे कभी-कभी कि वो लड़का आजतक कभी उसकी गोद में खेला ही नहीं जैसे गोकुल की गोद में खेलता था। उसे अपने आप पर धृणा भी हो रही थी कि शायद मैं कुबड़ी न होती तो आज ये लड़के के काले रंग को अपने होठों में समा लेती!

कृष्ण और कुब्जा की नज़रें मिली तब मथुरा के उस रस्ते पर खड़े हुए लोग उन दोनों को देखने लगे। कुछ लोगों ने तो ये मजाक भी किया कि अच्छी जोड़ी जमेगी इन दोनों की! काला कलूटा ये लड़का और ये कुबड़ी दासी कुब्जा! ऐसा जोड़ा देखने को न मिलेगा पुरे आर्यव्रत में!

ये सुनकर कृष्ण के दाहिने होठ थोड़े टेढ़े हो गए और हँस दिया। वो दोनों भाई कुब्जा के पास गए, कुब्जा हाथ में लाठी लेकर खड़ी थी और कृष्ण की काली आँखों में देख रही थी। मानो पूरा ब्रह्माण्ड समा गया था उन नन्ही सी आँखों में। अगर वो बदसूरत न होती तो बहक ही जाती! वो सोच रही थी कि अगर आँखें ही इतनी मदिरा की तरह मादक हैं तो उसके पूरे बदन में कितना नशा होगा! जब वो धीरे-धीरे पास आ रहे थे तब वो धीरे-धीरे अपनी चेतना में बदलाव महसूस कर रही थी। मानो वो अपने अंदरूनी हिस्से से खूबसूरत हो रही थी। जब कृष्ण एकदम उसके करीब आ गया तब वो भूल गयी थी कि वो एक राजा की दासी है और बेहद ही बदसूरत है! मानो उसे अपनी बदसूरती का कोई मलाल न रहा हो! वो सिर्फ इतना महसूस कर रही थी कि मथुरा के रास्तों से गुजरती हुई ये हवाएँ उसे अपनी पीठ पर बैठाकर कोई अनंत भाव-विश्व में ले जा रही हैं जहाँ सिर्फ वो थी और उसके सामने मखमल के बिस्तर पर पीतांबर पहने हुए ये लड़का लेटा हुआ था। मानो वो बुला रहा हो कुब्जा को अपनी आगोश में भरने के लिए और उस एक क्षण में सभी जन्मों का फासला मिटाने के लिए।

कृष्ण उनके एकदम करीब थे और हँस रहे थे। कुछ पल तो कुब्जा को लगा कि उसकी बदसूरती पर हँस रहे हैं लेकिन उसका ये भ्रम तब टूटा जब कृष्ण ने उससे पूछा कि तुम्हारा नाम क्या हैं सुंदरी!

सुंदरी! ये शब्द मथुरा के वातावरण में गूंज उठा। रस्ते पर चल रहे सभी लोग हँस दिए और बोले कि जब हमने इस नन्हे से लड़के की कंस के भेजे हुए राक्षसों को हराने की बात सुनी, तभी लगा था कि गोकुल के लोग पागल हैं! आज उस बात का यकीं हो गया, मथुरा राज्य की सबसे बदसूरत औरत को ये काला कलूटा लड़का सुंदरी बोल रहा है! और ये बात सुन कर कुब्जा के भवें भी चौड़े हो गए। पहली बार उसे किसी आदमी ने सुंदरी बोला था। समय उसके लिए मानो थम सा गया था, जैसे कि कल रात को वैश्यालय के दलदल में फँसी इस औरत का थम गया था!

४०वीं बार वो सीन रिप्ले करने के बाद उस औरत ने आँखें बंद कर लीं। वो भूलना नहीं चाहती थी वो रात, क्योंकि उस रात का हर क्षण उस औरत के जीवन का सबसे बेहतरीन लम्हे थें। कस्टमर के तौर पर आए हुए उस लड़के ने उसे वो आनंद दिलाया था जो अक्सर समाधी में मिलता है। अबतक वो मानती आई थी की ये सम्भोग सिर्फ उसके कमाने का एक जरिया हैं, लेकिन कल उसे पता चला था कि ये सिर्फ कमाने का जरिया नहीं हैं, ये वो कार्य है जिसमे आदमी या औरत या तो फिर दोनों परमतत्व यानि की भगवान के सबसे करीब होते हैं। आज से पहले उसे ये अनुभव कभी न हुआ था।

कल शाम को वो अपने बिस्तर पर बोझिल हुई पड़ी थी। दर्द हो रहा था उसे, सोच रही थी कि बस! अब और नहीं। सहना मुश्किल हो गया था, हर रोज उसे एक अनुभव ऐसा होता था जो उसकी मर्दों में दिलचस्पी को और कम कर देता था। वो चीखती थी, चिल्लाती थी लेकिन वहशियत और जंगलीपने से बेकाबू मर्द उसकी एक न सुनते थे और अपने जिस्म की प्यास बुझाकर चले जाते थे। वो अब ऊब गई थी मर्दानी जिस्मों से, और जितना ज्यादा वो मर्दानी जिस्म भोगती थी, या तो यूँ कहें कि जितना ज़्यादा मर्द उसका जिस्म चुगते थे, वो और ज्यादा रूहानी रिश्तों के लिए प्यासी हो जाती थी। वो चाहती थी कि कोई आए और उसकी रूह की प्यास बुझाए न कि सिर्फ वक्षस्थलों के उभारों पर लट्टु होकर इस्तेमाल करके चले जाएँ। लेकिन वो औरत लाचार थी, वेश्यालयों की दीवारें दर्द की लाचारियों से चीखती हैं, चिल्लाती हैं लेकिन तब भी वो औरतें इंतज़ार में होती हैं कि एक न एक दिन वो इस दलदल से बाहर निकलेगी और स्वतंत्रता की हवाओं को चूमेगी, वैसे ही जैसे कोई अल्लड लड़का पहली बार अपनी महबूबा के होठों को चूमता हैं! लेकिन ये आज़ादियाँ उनकी तकदीरों में नहीं लिखी होती, लिखा होता है तो सिर्फ बिस्तर की चद्दर में अपनी मुठी दबाकर और अपना मुँह हर एक सिसकते हुए आवागमन से खोलना और बंद करना!

वो आँखें बंद कर के इस सिसकते हुए दर्द के साथ अपने बचपन को याद कर रही थी जब बाप मर गया था और पड़ोस वाला अंकल उसे बम्बई में फिल्मो में काम दिलाने का बोल के इस जहन्नुम में लाया था! 14 साल की थी वो तब, सिर्फ 14! जिसने अब तक जिस्मानी संबंधों के नाम पर सिर्फ फिल्मों में अधरों को मिलते हुए देखा हो, उस लड़की पर अब बिस्तर पर चीखने और चिल्लाने की जिम्मेदारी आन पड़ी थी!

वो ये सब आँखें बंद करके सोच रही थी तभी इक 22 साल के लड़के ने दरवाजा खटखटाया। वो उस लड़के की इस हरकत पर हँस पड़ी और बोली कि नया लगता है बेचारा! क्योंकि आज तक कोई भी दरवाजा खटखटाके अंदर नहीं आया था! उस लड़के ने दूसरी बार दरवाजा खटखटाया और उस औरत ने कहा आ जाओ। उसे खुद ये पता नहीं था कई ये "आ जाओ" में वो उसे अस्तित्व में समां जाने के लिए पुकार रही है या सिर्फ जिस्मानी प्यास बुझाने के लिए!

वो लड़का अंदर आया और उसने बिस्तर पर लेती हुई औरत को देखा और उस औरत ने उस लड़के को देखा। लड़के के घुंघराले बाल थे जिसकी कंगी नहीं हुई थी, काली आँखें थी, सावला रंग और थोड़ा गभराया हुआ था। इस गभराहट के चलते औरत को पता चल गया था कि लड़का पहली बार कोठे पे आया है। मुश्किल से हँसने की कोशिश कर रहा था लेकिन गभराहट के मारे हँसी नहीं निकल रही थी। औरत को उसकी हालत पर हँसी भी आ रही थी और राहत भी हो रही थी और दुःख भी हो रहा था।राहत इसलिए क्योंकि वो दर्द में थी और लड़का अनुभवी नहीं था, उसे पता था कि ज्यादा कुछ कर न पाएगा। दुःख इसलिए क्योंकि उसे वो लड़का बेचारा लगा, अनुभवी न होने की वजह से उसने दिए हुए पैसों का ज्यादा कुछ मूल्य वो ले नहीं पाएगा।

लड़के ने कमरे में सबकुछ ध्यान से देखा। कमरे में लाल बत्ती जल रही थी और उसे पता था कि कोठों में लाल बत्ती इसलिए लगाते हैं ताकि लोग इन औरतों के अंगों की वीभत्सता देख न लें, जो कि अक्सर वैश्यालयों में पाई जाती है! लाल रंग मोहब्बत, इश्क़ का रंग था लेकिन वो ही लाल रंग यहाँ उसे बहुत ही डरावना और बदसूरत दिखाई दे रहा था! कमरे में एक पलंग था, जहाँ वो औरत लेटी हुई थी। दोनों पैरों में पहनी हुई पायल उस गौर-वर्णी त्वचा को ज्यादा खूबसूरत बना रही थी। औरत के होठों पे लाल लिपस्टिक थी जो कि दिन में उसे अक्सर 7-8 बार करनी पड़ती थी, क्योंकि कोई न कोई आकर वो लिपस्टिक को ख़राब कर देता था। औरत के ब्लाउस का एक बटन खुला हुआ था, अक्सर औरत वो बटन इसलिए खुला रखती हैं ताकि अपने प्रियतम पर काम-बाण चला सके लेकिन इस वैश्यालयों में ये हरकत उन वैश्याओं की मज़बूरी बयाँ करती थी! इन मजबूरियों की चीखती हुई सड़कों पर ये औरतें अपने आप को जिन्दा रखती हैं, इस आश में कि एक दिन ये सब ख़त्म होगा लेकिन इन मजबूरियों की सड़क कभी ख़त्म नहीं होती और वो इन सड़कों पर चलती ही जाती हैं फिर से अकस्मातो का सामना करने!

वो लड़का धीरे-धीरे वो औरत जहाँ सो रही थी, उस पलंग की ओर बढ़ रहा था। मानो पूरी चेतना उसे कह रही हो मत फँस इस दलदल में, भाग जा यहाँ से! लेकिन उस औरत का हुस्न उसे खींच रहा था। उसे उस औरत के प्रति तीव्र आकर्षण हो रहा था। वो लड़का पलंग के एकदम नजदीक जाकर टकराया, मानो औरत के हुस्न को देखते देखते वो ये भूल गया हो कि वो वैश्यालय में है! वो औरत हलकी सी मुस्कुराई और अपने निचले होंठ का दाहिना हिस्सा अपने दाँतों तले दबा दिया। लड़के ने भी बोखलाहट मारे हल्का सा हँस दिया और पलंग की दूसरी तरफ औरत के पैरों के पास बैठ गया। मानो वो उस औरत से नज़रें चुरा रहा हो! ये उन दोनों के लिए बिलकुल नया अनुभव था, लड़के के लिए भी और उस औरत के लिए भी। आजतक जो भी मर्द उस औरत के पास आए थे वो न तो शरमाते थे और न ही बौखलाते थे। हर इक मर्द वहशियत और जंगलीपने को अपने अंदर भरके आता था और अपनी हवस की प्यास बुझा के चला जाता था और उन मर्दो के जंगलीपने की वजह से दर्द से जूझती रहती थी। फिर एक नया मर्द आता था और इस औरत के अस्तित्व को तार-तार करके चला जाता था और इस तरह इस औरत ने पूरे 8 साल इस दलदल में गुज़ारे थे। ८ सालों में ये पहला लड़का था जो इतना शरमाया हुआ था, हालाँकि इस औरत को तर्बियत (ट्रेनिंग) दी हुई थी की अगर कोई शरमा रहा हो तो क्या करना चाहिए। उसी तर्बियत का आज ये औरत पहली बार इस्तेमाल करने जा रही थी। भले ही दर्द हो रहा हो फिर भी अपने कस्टमर को संतुष्ट करना हर एक तवायफ का धर्म होता है और आजकल धर्म मंदिरों में कम और इन तवायफखानों में ज्यादा देखने को मिलते हैं क्योंकि एक तवायफ ही है जो अपने कस्टमर के पैसों का पूरा मूल्य चुकाती हैं!

वो औरत खड़ी हुई और उस लड़के के पास जाकर बैठ गई। अबतक लड़के को सिर्फ औरत के लिपस्टिक वाले होंठ ही दिखाई दे रहे थे। करीब आने के बाद उसने उसका चेहरा देखा। चेहरा देखते ही लड़के की आँखों में वासना समंदर की लहरों की माफिक उछलने लगी। आँखों की वासना, होठों से टपटकती लार से कहीं ज्यादा पवित्र और मासूम होती हैं, इसलिए शायद शायरों को मेहबूबा की आँखों में दोनों जहाँ दीखते होंगे! लड़के की नज़र फिर उस औरत के उरोजों पर गई और वो बटन खुला हुआ देखने के बाद लड़के के मन में बवंडर मचा गया। फिर भी लड़के ने अपने चेहरे की रेखाओं में जरा भी फ़र्क़ न महसूस होने दिया। लेकिन उसके बावजूद उस औरत ने ये भाँप लिया कि लड़के के दिमाग पर कामदेव बैठ गया है। इतने साल तवायफखाने में गुजारने के बाद इस औरत को मर्दों के मुख-भाव का अच्छा खासा अभ्यास हो गया था, वो भाँप लेती थी किसी भी मर्द को उसकी चेहरे की रेखाओं से। उस औरत को लगा कि अब तो खामोशी तोड़नी ही पड़ेगी, वरना ऐसे नैन-मटक्को में तो पूरी रात बीत जाएगी। आखिरकार उस औरत ने खामोशी तोड़ी और लड़के को थोड़ा डराने के लिए औरत ने सख्ती से उसे पूछा
"क्या देख रहे हो इतनी ताज़ुब्बी से? कभी लड़की नहीं देखी क्या?"
लड़का - "देखी हैं ना ! लेकिन लड़की के रूप में मयकदा पहली बार देख रहा हूँ!"

ये सुनकर औरत के दिमाग में बिजली दौड़ गई। आजतक किसी ने भी उसके कुछ अंगो सिवा उसके हुस्न की कभी तारीफ़ नहीं की थी। वो हलकी सी मुस्कुराई, उसे लगा कि शायद आज की रात दर्द में बसर न हो! लड़का अभी भी उसकी आँखों में आँखें डालकर घूर रहा था, मानो उस औरत को मयकदा बोलने के बाद उसकी आँखों से जाम पी रहा हो!
औरत ने अवाक हो कर कहा, "माशाअल्लाह! अब ये मत बोलना कि तुम शायर हो, शायर तवायफ खानो में अच्छे नहीं लगते!"
लड़का - "क्यों नहीं लगते? शायर का एक ही साथी होता है और वो होता है जाम! जाम कहीं भी मिले वो पहुँच जाता हैं, चाहे वो मदिरालय हो या वैश्यालय!"

ये सुनकर औरत के भवें चौड़े हो गए। उसे पहली बार आज भगवान की तय की हुई किस्मत पर भरोसा बैठने लगा था। उसे लग रहा था कि इस वैश्यालय के दलदल में फँसना, हर रोज अपने शरीर के चीथड़े होने देना, ये सब कुछ इस लड़के को उसके साथ मिलाने के लिए ही भगवान ने किया होगा शायद! इंसान को राह शुरू करते वक्त ये पता नहीं होता कि सड़कें पक्की मिलेंगी या कच्ची, मंज़िल पर पहुँचने के बाद पता चलता है कि वो कच्ची सड़कों के बिना इस मंज़िल तक पहुँचना नामुमकिन था। वो हल्की सी मुस्कुराई और बोली, "गर शायर हो तो हम पे भी एक दो शेर सुना दीजिये जनाब'!

लड़का - मोहतरमा, हम शायर अपने शेरों में ज़िन्दगी का फलसफा निचोड़ते हैं और वो फलसफा हम ढूँढ़ते हैं अनुभवों से। अनुभव के बिना शायरी निकलती ही नहीं जेहन में से!

वो औरत लड़के का भाव समझ गई थी। आखिर इतने साल उसने मर्दों के आगोश में जो गुज़ारे थे! अब उसके दिल-ओ-दिमाग में भी तूफान मचा हुआ था। वो भूल गई थी कि अभी एक घंटे पहले ही एक मर्द उसके साथ बड़ी ही हैवानियत से पेश आया था और उसे दर्द हो रहा था! वो और करीब गई उस लड़के के और ध्यान से उसकी आँखों में देखा। पहली बार उसे किसी मर्द की आँखों में नशा दिख रहा था। कई बार कितने ही मर्दों ने उसे बोसा (चुंबन) दिया होगा, लेकिन आज पहली बार वो किसी मर्द को अपने लबों का जाम पिलाने जा रही थी! पहली बार उसे मोहब्बत में शरीर में दौड़ती बिजली का अनुभव हो रहा था। वो और पास गई उस लड़के के, एकदम उसके लबों के करीब। सिर्फ मिलीमीटर का फासला रहा होगा, लेकिन इस फासले में वो कई जन्मों का फासला मिटाना चाहती थी। लड़का उसकी खूबसूरती को पी रहा था, उसकी खूबसूरती लड़के की आँखों को आराम दे रही थी। लड़के ने आँख बंद कर ली और अनुभव करने लगा उस क्षण का जो क्षणार्ध में घटित होने वाली थी! उस ओर उस औरत ने भी आँखें बंद कर ली थी। वो ले जा रही थी अपने लबों को उस लड़के के लबों के पास। पहला ऐसा बवंडर वो देख रही थी जिसमें उसे अपने खत्म हो जाने का कोई गम नहीं था।

आखिरकार वो क्षण आ ही गया जिसके लिए वो सालों से तरस रही थी। उस औरत ने अपने लबों को उस लड़के के लब पर रख दिया। दोनों को लग रहा था की ब्रम्हांड में मानो कोई दो बड़े तारे टकराए हों और अपने वजन से दोनों ने वर्महोल बना दिया हो, की जिस वर्महोल में समय नष्ट हो जाता है, बिलकुल बे-पाबंद! और जैसे कोई आदमी उस वर्महोल में घुस कर ब्रम्हांड के किसी नए आयाम में पहुँच जाता हैं, एक नया स्थल, की जहाँ समय अनुभूति के परे होता है। वो अनुभूति आज दोनों को हो रही थी, दोनों बस सिर्फ आँखें बंद कर के समय के परे हो गए थे, की जहाँ सिर्फ घटित होना लिखा हुआ था।

औरत ने उस लड़के के मुँह को कसकर पकड़ लिया और ज्यादा बेताबी से उसके होठों को चूमने लगी। उसे लग रहा था कोई मुंबई का दलदल कहे जाने वाले कमाठीपुरा में नहीं हैं, लेकिन वो मोहब्बत का शहर कहे जाने वाले पेरिस में आइफ़िल टावर के नीचे हैं, जहाँ सूरज आधा ढल चुका हैं और अपने भगवे रंग को दोनों के लबों पर परिवर्तित कर रहा हैं! और साथ में खड़ा है आइफ़िल टावर, जो अब टूटके उस के ऊपर गिर जाए तो भी उसको कोई मलाल न होगा! वो बस चूमती ही जा लड़के के होठों को, और गहराई से और फिर दोनों गिर पड़े,बिस्तर में! जिनका खुद उन दोनों को पता नहीं था! आज इतने दर्द के बावजूद वो औरत चाहती थी कि कामदेव उस पर सवार हो जाए! वो आज तड़प रही थी काम-ज्वर से, इतने दर्द के बावजूद भी। क्योंकि वो दर्द उसके शरीर में हो रहा था और इस वक़्त वो ब्रम्हांड के किसी और आयाम की यात्रा कर रही थी। जिस आयाम को जिस्म से कोई लेना देना नहीं था, उन आयामों में सिर्फ रूह को आने की अनुमति थी, जिस्मानी सम्बन्धों वाले लोग के लिए उन आयामों में पाबन्दी होती है। क्योंकि वो आयाम खुदा, भगवान के घर से सबसे करीब होता हैं!

लड़के ने अब आँख खोल दी थी, वो देख रहा था उस औरत की आँखों में, जो कि अब तक बंद थी। उस औरत ने उस लड़के के मुँह को कसके पकड़ा हुआ था, जैसे कोई व्यापारी अपने जेवरात भरे थैले को पकड़ता है वैसे ही! लड़के ने अपने होंठ उस औरत के होठों से छुड़ाकर उसकी गर्दन पर रख दिए।
उस औरत के पूरे बदन में थोड़ी सी बिजली दौड़ने लगी। वो ब्रम्हांड के अज्ञात आयामों में इस अनजाने लड़के के साथ घूम रही थी अनंत तक और वो खुद आज अनंत हो जाना चाहती थी। लड़के ने धीरे-धीरे अपने होंठ औरत की छाती पर रख दिए थे! लड़का अब इस खुदा की बनाई हुई सबसे बेहतरीन चीज को अपने होंठो से पैगम्बरी का अनुभव करा रहा था! और उसके बाद. . . . . . . . . . उसके बाद बाकी बचे सभी बटन खुल गए!

हर एक सिसक के साथ दोनों को ब्रह्माण्ड के इस आयाम में एक परम दैदीप्यमान प्रकाश नज़र आ रहा था। हर एक बढ़ते जोर और हर एक नसों में बढ़ता खून का सर्क्युलेशन उन दोनों को उस प्रकाश के ज्यादा करीब ले जा रहा था। उस औरत और उस लड़के के सभी अंग कोई फकीरी मस्ती में ज़ूम रहे थे। दोनों की साँसें एक निश्चित गति से ऊपर नीचे हो रही थी। वे दोनों एक दूसरे की सासें अपने जेहन में महसूस कर रहे थे, मानो साँस ही हो जो उसे उस प्रकाश तक पहुँचने की ऊर्जा दे रही हो!

आखिरकार वो ऊर्जा का बाँध टूटा! औरत ने उस लड़के की पूरी ऊर्जा अपने आप में समा ली थी। जैसे कोई नदी का बाँध टूटने के बाद तबाही मचती है और उस तबाही के बाद सब कुछ शांत होता है वैसे ही उस कमरे में परम शांति छा गई थी। वो दोनों अपने आप को उस प्रकाश के अंदर महसूस कर रहे थे।अब वो बवंडर खत्म हो चुका था, वो लड़का आँख बंद करके हाँफ रहा था और वो औरत उसे हाँफते हुए देख रही थी और उसके गालों पर अपना हाथ फिरा रही थी। मद्धम मद्धम मुस्कुरा रहे थे दोनों। फिर से एकबार उस लड़के ने उस औरत के होठों को एक लम्बा सा बोसा दे दिया और फिर वो लड़का उस औरत के ऊपर से हटा और पलंग पर लेट गया। अपने हाथ का तकिया बना के वो औरत की आँखों में देख रहा था, औरत को आज पहली बार किसी मर्द की नरगिसी आँखों में करिश्माई नूर दिख रहा था। फिर औरत ने उस लड़के के होठों पर अपना हाथ फैलाते हुए पूछा, "शायर साहब! अब तो हो गया ना आपको अनुभव? अब तो बोल दीजिए एकाध शेर इस कनीज़ के लिए!"

ये सुनकर लड़का सोते हुए छत की ओर देखने लगा, एक क्षण के लिए खामोश हुआ लेकिन ये ख़ामोशी उस औरत को सदियों की लग रही थी। अंदर से वो चिल्ला रही थी जल्दी बोल दो कुछ! आखिर में लड़का औरत के लबों पर हाथ फेरते हुए बोला -
"दीदार-ए-अहद होता होगा काफिरों को बुतों में
हमारा खुदा तो इन लबों पे बसता है"!

और फिर वो हल्का सा मुस्कुराया और औरत से पूछा कि आपका नाम क्या हैं महोतरमा?
औरत बोली - 'रानी'
लड़का फिर मुस्कुराता बोला - "हमने असली नाम पूछा हैं मोहतरमा!"
रानी इस लड़के की दिमागी खूबी पर आफरीन हो गई और हँस के बोली - "तबस्सुम!"
लड़का - "या खुदा! नाम में भी होठों का इस्तेमाल होता हैं! तबस्सुम मतलब हँसी! और आपके होंठ तो हैं ही पूरी की पूरी कयामत!"

अब तबस्सुम जोर से हँसी, शायद पहली बार वो इतना खुल कर और जोर से हँस रही थी! हँसते-हँसते तबस्सुम ने पूछा, "और आपका शायर साब?"

लड़का - "भई हम तो मोहब्बत के मानींदे हैं! जन्म के वक्त बाढ़ आई थी गाँव में, इसलिए घरवालों ने माधव नाम रख दिया!"

ये सुनकर तबस्सुम फिर से हँसी और अपनी आँख मिचका कर बोली - "बहुत अच्छी मोहब्बत कर लेते हैं!"

माधव हँस पड़ा और बैठ गया, वो देख रहा था तबस्सुम का हुस्न को और तबस्सुम देख रही थी लड़के के बदन को। इतने चौड़े बदन वाला आदमी अभी उसके ऊपर था फिर भी उसे ज़रा सा भी दर्द महसूस नहीं हो रहा था। इस प्रश्न का जवाब उसे न मिला और शायद कभी मिलने वाला भी नहीं था! वो भी माधव के साथ बैठ गई और फिरसे उसकी आँखों में देखने लगी। अब इस बार माधव अपने होंठो को तबस्सुम के होंठो के करीब लाया और फिरसे एक लम्बा चुंबन घटित हो गया दोनों के बीच!

और इन्ही चुंबनों के साथ रात कहाँ बीत गई ये उन दोनों को खबर न रही! वो दोनों पूरी रात एक दूसरे के आगोश में रहे कोई अगोचर विश्व की यात्रा करते रहे। इन्ही ब्रह्माण्ड की विशालता और शरीर की गहराईयों में घूमते-घूमते दोनों को कब नींद आ गई ये पता ही नहीं चला। वैसे भी वैश्यालयो में वैश्याएँ सिर्फ दिन अपनी मर्ज़ी से नहीं गुज़ार पाती लेकिन रातों को वो आज़ाद होती हैं! इन्ही आज़ादी के चलते तबस्सुम माधव की बाँहों में पड़ी थी।

सुबह में तबस्सुम अंगड़ाईयाँ लेकर उठी, अंगड़ाई लेते वक्त वो ऐसे लग रही थी की मानो कोई फूल सूरज की किरणें अपने आप में समाने के लिए अपनी पत्तियाँ खोल रहा हो! आज उसे रात की वजह से दर्द नहीं हो रहा था, उसे पहली बार आज कामदेव की पूजा करने का मन हो रहा था! कि अगर वो न होते तो इस पूरी दुनिया को वह सुख न मिलता जो उसे परमात्मा के सबसे करीबी होने का एहसास दिलाता था। अपने हाथ अंगड़ाई लेने के लिए उठाकर वो अपने बदन की खुशबू को सूंघ रही थी क्योंकि आज उसे अपने बदन में मर्दों की हेवानियत की बू नहीं आ रही थी,आज उसे अपने पूरे बदन में माधव की खुशबु आ रही थी। वो माधव जिसे आज तक सिर्फ कहानियो में सुना था और तबस्सुम को वो काफिरों का भगवान लगता था। लेकिन फिर भी वो कभी-कभी उत्सुक हो जाती थी रासलीला के बारे में सुनकर कि कैसे गोपियों को लगता था की कृष्ण उसके साथ हैं लेकिन वो तो सिर्फ बीच में बांसुरी बजाते थे और गोपियाँ उसके आसपास भ्रम के मारे नृत्य करने लगती थी। अंगड़ाई लेते वक्त वो कोई नवोढ़ा लग रही थी, वैसी ही नवोढ़ा जो अभी कुछ घंटे पहले ही लड़की से स्त्री बनी हो!

तबस्सुम ने अपनी आँखें खोली और आसपास देखा, पलंग के नीचे उसके कपडे पड़े थे और पलंग की चद्दर पर सिलवटें हो गयी थी जो की इस बात का प्रमाण थी कि कल रात को इस पलंग के ऊपर तूफान आया था! तबस्सुम ने आसपास नज़र की, उसकी नज़र माधव को ढूँढ रही थी। नज़र फिरते-फिरते कमरे के पीछे वाले हिस्से तक पहुँच गई जहाँ एक बड़ा सा आइना था। तबस्सुम ने उस आईने में अपनी पीठ को देखा, पीठ पूरी लाल हो चुकी थी और कल रात में सिद्दतो से की गई महोब्बत का बयाँ कर रही थी। उसने अपना चेहरा देखा आईने में, जो की पूरी तरह गुलाबी हो गया था, वैसे ही जैसे कोई लड़की का चेहरा अपने महबूब के लब से अपने लब टकराने के एक क्षण पहले होता है! घुँघराए हुए बाल कमर तक आ रहे थे, अपने बालों को वो अपनी उँगलियों से पकड़ कर दूसरी ओर ले गई और मन ही मन बोली कि माधव होता तो इस अदा पर भी एकाध शेर सुना देता! उसने आईने से नज़र हटा ली और अपने कपड़े पहनने के लिए पलंग से उठने ही जा रही थी कि उसे इक कागज़ का टुकड़ा मिला। कागज़ का टुकड़ा देख कर वो अंतरमन से खुश हो गई क्योंकि उसकी भी तमन्ना थी कि कोई उसे भी लव लेटर लिखे! दो चार मिर्ज़ा के शेर सुनाए और एकाध बार गुलाम अली की गजल गए! उसने झटपट से वो कागज़ खोला जिसमें दो लाइन लिखी और एक शेर लिखा था। उस कागज़ में लिखा था कि
"अगर कभी मेरी याद आए, तो अपने लबों पे जरा हाथ फेर लेना
मैं आ जाऊँगा, उन लबों को चूमने!"

"मीर" हम मिल के बहुत खुश हुए तुमसे प्यारे,
इस खराबे में मेरी जान तुम आबाद रहो"
मीर तकी मीर

यह पढ़कर तबस्सुम के गुलाबी गलों पर आँखों में से निकली हुई आँसू की इक बूंद टपक पड़ी। उसे पता चल गया था कि उसकी मोहब्बत अब कभी वापिस नहीं आने वाली। खुद को दुनिया की सबसे बदकिस्मत औरत समझ रही थी क्योंकि उसे अपनी मोहब्बत तो मिल ही गई थी लेकिन सिर्फ चंद घंटो के लिए। वो चंद घंटे जो उनकी जिन्दगी के सबसे बेहतरीन लम्हे बन गए थे। तबस्सुम चाहती थी माधव वापिस आए और उसके जिस्म को रौंद कर चला जाए, क्योंकि फिर रौंदे हुए शरीर के अंदर वाली रूह उसे माधव से मिलाएगी, जो कि इस हिज्र के लम्हे से कई ज्यादा बेहतर होंगे! लेकिन थोड़ी देर बाद उसे अपनी किस्मत का एहसास हुआ, उसने अब ये मान लिया था कि उसकी पूरी जिंदगी अब इस वैश्यालय के कमरों में ही गुजरने वाली है! लेकिन फिर भी उसे हर चीज़ में माधव की परछाई दिखाई दे रही थी। मोहब्बत होने पर आदमी हो या औरत, बावले हो जाते हैं। वो अपने कपड़ों में भी माधव की खुशबु को चूम रही थी। उसे याद आ रहे थे वो पल जब माधव ने उसकी चोली को जोर से खींच कर उतार दिया था। वो महसूस कर रही थी माधव के आलम को फ़िज़ाओं में क्योंकि तबस्सुम के पास अब वो लब थे जिसको माधव ने चूमा था, वो वक्षस्थल थे जिसका माधव के होठों ने आमों की तरह रसपान किया था, वो गाल थे जिस पर माधव ने अपना रुक्ष हाथ रखा था। तबस्सुम के जेहन में माधव था जिसे वो अब खोना नहीं चाहती थी!

४०वीं बार उस सीन को देखने के बाद तबस्सुम को वो बंद करना पड़ा क्योंकि दरवाजे पर फिर किसी मर्द ने दस्तक दी थी। तबस्सुम का दिल कह रहा था कि काश वो माधव हो। लेकिन चंद क्षणों में उसका ये भ्रम टूट गया जब एक लम्बा चौड़ा ६ फुट का आदमी कमरे में आया। तबस्सुम को उस आदमी में वो ही वहशीपन और हवस दिख रही थी जो और मर्दों में वो देखती थी। वो आदमी माधव की तरह शरमा नहीं रहा था, वो झट से अपनी कमीज़ खोलने लगा मानो कितने सालों से अनुभवी हो! कमीज़ का बटन खोलते वक़्त वो तबस्सुम के सामने हँस रहा था। तबस्सुम को उस आदमी के पीले दांत दिखाई दे रहे थे, उस आदमी के रोम-रोम में तबस्सुम को हवस दिखाई दे रही थी! वो अंदर ही अंदर से माधव को याद कर रही थी कि काश जैसे हज़ारों साल पहले उसने भरी सभा में एक औरत की इज्जत बचाई थी वैसे ही वो आज आएँ और उसे यहाँ से ले जाएँ। वो अपने मन ही मन में माधव माधव का जाप जप रही थी। लेकिन फिर उसे याद आया कि हज़ारों सालों पहले उस औरत को उसके पाँच पतियों ने उसे जुगार पर रखा था, जबकि इस समय तो उसने खुद अपने आप को इस जुगार में फसाया है!

वो आदमी जंगलियत के साथ तबस्सुम पर टूट पड़ा, मानो कई जन्मों का बैर हो उसे तबस्सुम के साथ! चद्दर की सिलवटें भी तबस्सुम के दर्द में अपना भाग दे रही थी, मानो वो भी माधव को ही ढूँढने निकली हो! बाजू की कोठी से गुलाम अली की की ग़ज़ल "चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद हैं" की आवाजें आ रही थी। हर एक सिसक के साथ वो माधव का जाप और तेज कर रही थी लेकिन माधव कही नहीं था या तो फिर शायद वहीं था, तबस्सुम के अस्तित्व में, उसकी रूह में! और वो गुलाम अली की ग़ज़ल "आ गया गर वस्ल की शब भी कही जिक्र-ए-फ़िराक, वो तेरा रो रो के भी मुझको रुलाना याद हैं" की लाइन पर रेडिओ टूटने की एक बहोत बड़ी आवाज के साथ रुक गई!

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