लज़ीज़ पकवान  Pradeep Kumar Rajak

लज़ीज़ पकवान

यह कहानी नारी के प्रति समाज में व्याप्त घरेलू यौन हिंसा को दर्शाती है

गर्मियों के दिनों में मेरी बेटी और पोती एक हफ्ते के लिए मेरे यहाँ छुट्टियाँ बिताने आए हुए थे। जब बेटी नौ साल की थी मेरी पत्नी का स्वर्गवास हो गया था, उसकी स्मृतियों को प्रतिदिन अपने मानस पटल पर जीवित करना अब मेरी आदत बन गई है। पत्नी की मृत्यु के पश्चात घर के सारे काम का बोझ मुझ पर आ गया था जिसे मेरी नन्हीं गुड़िया ने अपने कंधों पर भी बाँट लिया।

रसोई के काम में कब वो निपुण हो गई मालूम ही नहीं चला, कभी कभार भोज में आमंत्रित मित्र जब मेरी बेटी की पाक कला की उन्मुक्त हृदय से प्रशंसा करते, मेरी छाती चौड़ी हो जाती। जब वह बड़ी हुई, मुझे उसके ब्याह की फिक्र हुई। मगर किस्मत से उसकी शादी के लिए मुझे ज्यादा हाथ पैर नहीं मारने पड़े, अच्छे घर में रिश्ता जुड़ गया। उसके ससुरालवालों का कहना था कि निश्चय ही ईश्वर ने बिन माँ की लड़की के हाथों में जादू भर दिया था और यही खूबी उसकी बेटी यानी मेरी पोती लक्ष्मी में भी थी। अभी वह बारह साल की ही थी लेकिन खाने में वही सुगंध और वही स्वाद, इसलिए सप्ताह भर मैं वही पुराना स्वर्गीय स्वाद चखने की कल्पना से ही रोमांचित हो उठा था।

शनिवार के दोपहर के खाने में मैंने अपने एक पुराने मित्र को आमंत्रित किया था, वो जनाब शायद स्वादिष्ट भोजन के लालच में तय वक्त से कुछ पहले ही पहुँच गए। ना जाने क्यों उनको देखकर मेरी बेटी के चेहरे पर नागवारी के भाव उभर आए, फ़िर भी उसने शिष्ट भाव से उन्हें प्रणाम किया और मेरी पोती लक्ष्मी ने पैर छू कर आशीर्वाद लिया। हम दोनों मित्र बैठक में जाकर बातें करने लगे, वहाँ से नीचे सड़क पर आते जाते लोग दिख जाते थे। अचानक मेरी बेटी को जब पड़ोस की उसकी सहेली ने बाहर से आवाज़ लगाई तो वो मुझे लक्ष्मी पर ध्यान देने को कह कर चली गई। वो अपने मायके आयी हुई थी और संयोग से मेरी बेटी भी आ पहुँची थी, बचपन की सहेलियों में जो लगाव व स्नेह होता है वह अन्य किसी से नहीं हो पाता। लक्ष्मी रसोईघर में खाना बना रही थी, कुछ देर बाद बैठक से नीचे सड़क पर जाते हुए मास्टर जी दिखाई दिए। सब उन्हें मास्टर जी ही कहते जबकि मेरी जानकारी में वो कहीं भी शिक्षक नहीं हैं। उनकी खूबी है कि उन्होंने अपने सारे परिचितों से कर्ज़ ले रखा है और मैं भी उनमें से एक था। उन्हें देखते ही मुझे क्रोध आ गया, ये क्या बात हुई कि ज़रूरत के वक्त तुरंत लौटाने का वादा कर के रुपये लो और फ़िर महीनों अपनी सूरत ना दिखाओ। मैंने उन्हें याद दिलाने की मंशा से ऊपर से ही आवाज़ लगाई, वो मुझे नीचे आने का इशारा करने लगे, मुझे लगा आज अपने रूपये वापस मिलने वाले हैं। मैं अपने मित्र से वहीं बैठने को कहकर नीचे चला गया, मास्टर जी ने ऐसे-ऐसे नए बहाने बताते हुए उधार चुक्ता करने का फ़िर से वादा किया कि मेरा क्रोध जिन्न की तरह गायब हो गया और मेरी वाणी नरम ही रही।

वापस बैठक में लौट कर देखा तो मेरे मित्र वहाँ मौजूद नहीं थे। मैं उन्हें इधर-उधर ढूँढ़ने के लिये नज़रें फिरा रहा था कि रसोईघर से बर्तन गिरने की तेज झंकृत आवाज़ कानों में पड़ी। मैं तुरंत लक्ष्मी को पुकारते हुए रसोईघर पहुँचा, मेरे मित्र फर्श पर गिरे बर्तन को उठा रहे थे और लक्ष्मी सिकुड़ कर एक कोने में खड़ी थी। उसकी आँखों से स्पष्ट था वो भयभीत थी, मुझे देख कर लक्ष्मी मुझ से लिपट गई। "क्या हुआ बेटी!" मैंने पूछा, उसके जवाब देने से पहले ही मेरे मित्र बोल उठे - "गलती से मैंने बर्तन गिरा दी और बच्ची डर गई।" इतने में मेरी बेटी आ गई और हमें रसोईघर में देखकर आशंकित होकर पूछने लगी - "क्या हुआ?" मैंने उसे बता दिया कि बर्तन गिर गया था। मेरे मित्र और मैं वापस बैठक में आ गए। बातें करते वक्त मेरे मित्र मुझसे आँखे चुरा रहे थे मगर मैंने इसपर ध्यान नहीं दिया उस वक्त। लेकिन ये सवाल मेरे मन में उठ रहा था कि ये रसोई में क्यों गए थे। उन्होंने मानो मेरे मन को पढ़ लिया. अचानक ही कहने लगे - "मैंने बच्ची को डरा दिया, प्यास लगी तो पानी माँगने गया और मुझसे बर्तन गिर गया।" "कोई बात नहीं, हो जाता है ऐसा"- मैंने शिष्टाचारपूर्ण शब्द कहे ताकि उनकी झेंप मिट सके। खाना बनने में कुछ विलम्ब हुआ जिससे मैं झुंझला रहा था। गुस्सा आ रहा था, इस तरह भला कोई करता है कि किसी को खाने पर बुलाओ और घंटों बिठाए रखो, पर जब आँखो के सामने भोजन परोसा गया मुँह में पानी आ गया और शायद उसी ने क्रोधाग्नि को भी शांत कर दिया। आखिरकार पहला निवाला गले के अंदर गया, मन हुआ कि खाना थूक दूँ, स्वाद बिल्कुल फीका था या घटिया कह सकते हैं, ऐसा जो खाने लायक ना हो। मैंने तुरंत अपनी बेटी से कह दिया, वो चौंक उठी - "क्या?" चौंकने के साथ-साथ उसमें डर और किसी अनहोनी की आशंका जैसे भाव भी थे। मेरे मित्र हल्की हँसी से कहने लगे - "कोई बात नहीं बच्चों से गलतियाँ हो जाती हैं। तो क्या हुआ मुझे तो बहुत लजीज लग रहा है।" मेरी बेटी ने भयभीत और गुस्साए आँखों से मेरी तरफ़ देखते हुए कहा - "ये बहुत बुरा हुआ..." फ़िर कुछ क्षण रुक कर बोली - "ऐसा कभी नहीं हुआ बाबा, वो हमेशा ध्यान रखती है। पता नहीं कैसे आज..."

अकस्मात मेरे मन में कई वर्षों पुरानी स्मृति उभर आई, जब मेरी बेटी छोटी थी ऐसे ही एक दिन उसने बहुत बुरे स्वाद का खाना बनाया था और संयोगवश यही मित्र उस दिन आमंत्रित थे और गहरा संयोग यह कि उस दिन भी ये किसी बहाने रसोई गए थे और मेरी बेटी ने चीख कर मुझे पुकारा था। जब मैं वहाँ पहुँचा तो मेरी बेटी रो रही थी और ये साहब सकपकाये से खड़े थे बगल में, तब उन्होंने कह दिया था कि आग में बच्ची का हाथ आ गया था। लेकिन मैंने बेटी का हाथ देखा था तो उसपर जले का कोई निशान नहीं था और ये मेरी समझ में अच्छी बात थी। ज़रूरी नहीं कि हमेशा जले का निशान बने ही, लेकिन अब मुझे अपनी बेटी की वो चीख और बर्तन की झंकृत आवाज़ एक समान लग रहे थे। मानों दोनों ही ध्वनियों का स्रोत एक ही हो, एक निरीह की तीव्र प्रतिक्रिया, एक विरोध। मेरी बेटी की आज की प्रतिक्रियाओं का भाव मुझे समझ में आ गया था। बिन माँ की लड़की अपनी बेटी को उन बुरे हालातों से नहीं गुजरने देना चाहती जिससे वो गुज़र चुकी है। मुझे अब मालूम था खाना क्यों बेजायका है और ये भी कि जिस इंसान को मैं अपना मित्र समझता था वो क्यों इस घटिया खाने को लजीज कह रहा था। अपनी कुकर्मों पर पर्दा डाल रहा था। मैंने दोषी सा महसूस करते हुए अपनी बेटी की आँखों में देखा, मगर उसकी आँखों में निर्जीवता विराजमान थी जिसे भेदने की शक्ति एक बाप में नहीं है।

छुट्टियाँ ख़त्म हो गईं, मेरी बेटी और पोती वापस चली गईं, लेकिन एक ऐसी गहरी वेदना छोड़ गईं, जो तब और भी कष्ट देती जब मेरी स्वर्गवासी पत्नी स्मृतियों में नाच उठती। काश वह जीवित होती, शायद मेरी बच्चियों के साथ ऐसी घिनौनी घटनाएँ ना होतीं या वह उन्हें सांत्वना दे पाती। उन्हें अपने सीने से लगा कर उनका दुःख बाँट पाती। जहाँ तक मेरे उस मित्र की बात है, मैंने उसे बाद में उसके घर जाकर उसकी बीवी और बेटों-बहुओं के सामने एक ज़ोरदार थप्पड़ जड़ा और कहा - "ये झूठ बोलने के लिए, बेस्वाद खाने को लजीज बताने के लिए।" मैं उसे जो समझाना चाहता था वह समझ गया क्योंकि फ़िर उसने अपनी शक्ल दोबारा कभी नहीं दिखाई।

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