इतनी अच्छी भी नहीं होनी चाहिए  SUBRATA SENGUPTA

इतनी अच्छी भी नहीं होनी चाहिए

इस संसार में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपनी बुरी आदतों को से कभी बाज़ नहीं आते, चाहे उनको कितना बड़ा सबक ही क्यों न मिल जाए, यह व्यंगात्मक कहानी ऐसे ही एक व्यक्ति पर आधारित है जिसके पीछे एक सीख भी छुपी हुई है।

इस संसार में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो दूसरों के नुक्स निकालने में अपने आप को अव्वल समझते हैं। ऐसा ही एकअव्वल था बोधन राम, वह अपने क्षेत्र में उसके इसी स्वभाव के लिए प्रचलित था। उसके इस स्वाभाव के कारण सभी डरते थे। गाँवों में किसी भी परिवार में कोई कार्यक्रम चलते समय विशेषकर बोधनराम का ध्यान दिया जाता था ताकि उसके साथ कोई त्रुटि न हो जाए और नुक्स निकालने का उसे मौका न मिल जाए।

आखिर पुरज़ोर ध्यान रखने पर भी वह कोई न कोई नुक्स निकाल ही लेता था। इसी प्रकार समय बीतता गया परन्तु बोधनराम में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। उसने अपना अभ्यास निरंतर जारी रखा। बोधनराम के गाँव वाले अब उसकी आदत से अभ्यस्त थे।

मानव सामाजिक प्राणी है और समाज में हर प्रकार के इंसान हिल-मिल कर निवास करते हैं। वे समाज में रहकर समाज के ताने का जाल बुनते रहते हैं और इसी ताने-बाने जाल में फँस कर छटपटाते हुए जीवन की अंतिम श्वास लेते हैं।

समाज है! इसे छोड़ कर जाएँ भी तो कहाँ जाएँ क्योंकि मानव जानते हैं कि यह पृथ्वी गोल है। एक चक्कर लगाने के बाद उसे उसी जगह आना है।

शायद इसलिए जानकार इंसान इस सामाजिक बंधन में फँसना नहीं चाहते और सामाजिक बंधन से दूर भागने के लिए निरर्थक हाथ पैर मारते रहते हैं पर लाभ क्या है? आखिर थककर इसी ताने-बाने के जाल में फँसकर छटपटाते रहते हैं और अपने अंतिम दिनों की गिनती गिनते रहते हैं।

जो भी हो इसे जानकर इंसानों के समुदाय का एक सदस्य था ज्ञानचंद्र जो कि बहुत ही समझदार था। ज्ञानचंद्र की बेटी की शादी तय हो चुकी थी। निर्धारित तिथि समीप थी। पुरजोर तैयारियाँ हो रही थी। कहीं भी कुछ ऊँच-नीच न हो इसका पूर्णरूपेण ध्यान दिया जा रहा था। बोधनराम भी उसी गाँव का निवासी था इसलिए ज्ञानचंद का ध्यान भी विशेषकर बोधनराम की ओर था। उसने अपने सभी सहयोगियों से कह रखा था कि हमारी ओर से कोई त्रुटि न हो जिससे बोधनराम कोई नुक्स निकाल सके।

निर्धारित तिथि पर बड़ी धूमधाम से ज्ञानचंद्र की बेटी का विवाह संपन्न हुआ इतनी व्यव्यस्तता में भी बोधनराम पर विशेष ध्यान रखा गया ताकि उसके साथ कोई त्रुटि न हो। बेटी की विदाई हो गई। गाँव वाले एवं ज्ञानचंद्र के विशेष खास सहयोगी बड़ी मुखरता से ज्ञानचंद्र की प्रशंसा कर रहे थे। ज्ञानचंद्र की प्रशंसा की बातें बोधनराम को बदहज़मी प्रतीत हो रही थीं। आखिर वह अपने स्वाभाव से ग्रसित होकर उल्टी कर ही दिया। उसने कहा आप लोग ठीक ही कह रहे हो परन्तु मेरे विचार से इतनी अच्छी भी नहीं होनी चाहिए।

चाहे इंसान कितना भी प्रयास कर ले परन्तु इस संसार के कुछ इंसानों की आदतों में परिवर्तन करने में असफल ही रहेंगे। ज्ञानचंद्र के अथक प्रयासों के बावजूद बोधनराम द्वारा नुक्स निकालने की आदत में परिवर्तन करने में असमर्थ था। चाहे बोधनराम द्वारा निकले नुक्स सामजिक अर्थों में निरर्थक ही थे।

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