हाय रे... प्याज़!  Mohanjeet Kukreja

हाय रे... प्याज़!

मौजूदा दौर की एक ऐसी शय की कहानी जो आँखों में पानी लाने के लिए काफ़ी है...

"तुम्हारी यह फ़िज़ूलख़र्ची की आदत कभी जाएगी?"

"अब क्या हुआ भाग्य-वन (इससे भाग्य-टू की उम्मीद बनी रहती है!)?" मैंने अपना पेग किचन की स्लैब पर रखते हुए कहा। वैसे मेरी बीवी का कहना है कि मैं 'उसकी किचन' पे कब्ज़ा किए रहता हूँ, देखा जाए तो बात कुछ हद तक तो ठीक ही है। कुछ अंदेशा तो मुझे हो चला था कि मैडम ने मेरी अभी खोली 'वैट ६९' की बोतल देख कर अपना आज का भाषण तैयार कर लिया होगा - नशा ही करना हो तो 'ब्लेंडर्स' या 'रॉकफोर्ड' क्या बुरी है? इतनी महॅंगी दारु लाने की क्या ज़रुरत है? तुमसे यह तो होता नहीं कि ज़्यादा अच्छी वाली पियो और कम पी लो... वग़ैरा... इत्यादि। लेकिन मुद्दा शायद कुछ और था -

"लो, थोड़ा तुम भी खा लो," मैंने ख़ुद बनाए ऑमलेट की प्लेट बढ़ाते हुए कहा।

"इतना प्याज़ डालना ज़रूरी है क्या? बल्कि डालते ही क्यों हो प्याज़?" एक टुकड़ा खाते हुए मैडम ने स्पष्ट किया कि निशाना किसके ऊपर था।

"क्या? प्याज़ न डालूँ?"

"हाँ, क्या हर्ज़ है? प्याज़ का रेट पता है तुम्हें? कभी घर के काम करो तो पता चले न।"

"अरे मैं क्या जैन हूँ, बिना प्याज़ के ऑमलेट खाऊँ?" मार का दायरा बढ़ता पाकर मैंने हँसते हुए कहा, वैसे मेरी बीवी को ७-७ रुपये के दो अण्डों से ज़्यादा एक छोटे से प्याज़ की क़ीमत अखर रही थी।

लेकिन देखा जाए तो उसका भी क्या दोष था। मैं खरीद कर भले ही न लाया होऊँ, आजकल प्यार की जगह प्याज़ के जो चर्चे सब जगह, हर ज़ुबान पर थे उनसे मैं अनजान भी नहीं था। हमारे देश के क्रिकेट से भी अधिक लोकप्रिय खेल, बलात्कार से भी ज़्यादा ख़बरें इन दिनों जी.डी.पी. से उलट प्याज़ के नित-बढ़ते दामों की सुनाई देती थीं। कहीं हेलमेटधारी मोटरसाइकिल सवारों को प्याज़ देकर प्रोत्साहित किया जा रहा था, तो कहीं मोटी आसामियाँ शादियों में मिठाई की जगह प्याज़ के डिब्बे बाँट रही थीं। हद तो तब हो गई जब मैंने सुना सूरत के एक ब्लड डोनेशन कैंप में रक्तदाताओं को एक-एक किलो प्याज़ देकर आभार प्रदर्शित किया गया... ख़ून सफ़ेद होते, पानी होते तो सुना था, प्याज़ होते सुनना अभी बचा था! कुछ ढाबों से तो प्याज़ गधे के सर से सींग की तरह ग़ायब हो गए थे, नयी दुल्हनें आज-कल खाना बनाते वक़्त आँसू कम बहाती थीं, चोर-डकैतों का टारगेट रुपये-पैसे से हट कर प्याज़ हो गया था।

फ़ेसबुक पर कुछ शरारती और कमबख़्त लोग दूसरों को अपने पर्यटन से जलाने वाली फ़ोटोज़ की जगह थाली में रखे हुए खाने की ऐसी तस्वीरें डालने लगे, जिनमें पूरा फ़ोकस कटे हुए प्याज़ पर होता था। व्हाट्सऐप पर प्याज़ को ले कर इतने मीम घूम रहे थे जितने पोस्ट्स धारा ३७० हटने पर भी परिचालित नहीं हुए होंगे । मशहूर शेफ़ अपने फॉलोअर्स को बिना प्याज़ की रेसिपी बता कर वाह-वाही लूटने में लगे थे।

उस दिन तो बात जैसे तैसे रफ़ा-दफ़ा हो गई...

फिर एक दिन इतवार की छुट्टी थीं, मैंने सोचा मैडम को आज लंच में रसोई से दूर रखके (जो वे चाहती हैं हमेशा हो सके) थोड़ा ख़ुश किया जाए। बड़ी अहमकाना सोच थी!

चिकन मैं पिछली रात को ले आया था, मगर सिर्फ़ वो बनाने से बात बननी न थी (क्या बने बात जहाँ बात बनाए ना बने), क्यूँकि मैडम खाती नहीं। एक कुशल ग्रहणी की तरह मैंने पहले ही सब मसाला वग़ैरा काट लिया और बाक़ी तैयारी करली। चूल्हे के एक बर्नर पर मैंने कूकर में दाल चढ़ाई, दूसरे में चावल पकने रख दिए, तीसरा दाल को छौंक लगाने के लिए खाली छोड़ कर चौथे पे चिकन बनना रख दिया। इस-बीच मैंने अपनी बादाकशी बादस्तूर जारी रखी।

खाना टेबल पर लगा कर मैं बैडरूम में टीवी का लुत्फ़ उठातीं बेगम और अपनी लख़्त-ए-जिगर को बाक़ायदा दावत नामा देकर आया। खाना बढ़िया था, सबने मज़े लेकर खाया। उसके बाद जैसे ही मैडम का फेरा रसोई में लगा, फ़ौरन मेरी पेशी हुई; वैसे मैं बीवी से डरता नहीं हूँ - यह बात मैंने उसकी इजाज़त से ही लिखी है।

जाकर देखा तो मैडम प्याज़ों की टोकरी के बराबर में ऐसी गंभीर मुद्रा बनाए खड़ी थीं जैसे अस्पताल में भर्ती किसी रिश्तेदार को देखने आई हों...

"तुमने आधा किलो चिकन में कितने प्याज़ डाले?"

"दो-तीन डाले होंगे,,," अच्छा तो मैडम को रेसिपी समझनी थी, मैंने चैन की साँस ली!

"दो-तीन नहीं, पूरे तीन! मैंने गिने हुए हैं।"

"अरे! कोई प्याज़ भी गिन कर रखता है क्या?!"

"मैं रखती हूँ, कोई ऐतराज़?"

"तुम्हारे पास और बेहतर काम नहीं हैं ज़िन्दगी में? और अब तो सस्ते भी हो गए प्याज़, मैंने परसों ही पेपर में पढ़ा था अब ५०-६० रुपये किलो मिलेंगे।"

"जब मिलेंगे तब देखेंगे, अभी तो तीस-पैंतीस रुपये का रेट है।"

"लो, हो गए न फिर सस्ते! और कितने अच्छे दिन आएंगे भई अब; मैं तो पचास-साठ रुपये किलो सोच रहा था!"

"यह एक पाव का रेट है, अब प्याज़ भी ऐसे मिलने लगे हैं जनाब। मैं आजकल सब्ज़ियों में आधा-आधा प्याज़ डालती हूँ और तुम... "

बेडा गर्क़! बात एक बार फिर बिगड़ने वाली थीं। मैंने समझदार पतियों की तरह अपनी ग़लती (जो इस बार थी भी!) मान कर तुरंत माफ़ी माँगी और वादा किया कि आइंदा मैं इस चीज़ का पूरा ध्यान रखूँगा... रसोई और रईसी की इस बेश-क़ीमती अलामत को पूरी इज़्ज़त दूँगा।

बात बनी तो ज़रूर, लेकिन शाम को एक नयी पिक्चर दिखा कर, और रात का खाना बाहर खिला कर...

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