अंतरात्मा  Mohanjeet Kukreja

अंतरात्मा

ज़मीर के हाथों मजबूर एक अंतरात्मा की कहानी…

"हाँ तो न्यू इयर ईव पर तुम कहाँ गए थे?"

"मैंने बताया न साहब, बहादुरगढ़..."

"बहादुरगढ़ में कहाँ?"

"एक दोस्त के किसी रिश्तेदार के फ़ार्म-हाउस पर ।"

"वहाँ क्या करने गए थे?"

"सर, नए साल की पार्टी मनाने ।"

"किस दिन की बात है यह?"

"नए साल की पार्टी, सर ।"

"वो मैंने सुना, तारीख़ बोलो!"

"अब न्यू ईयर ईव तो ३१ दिसंबर को ही होती है..."

"ठीक है, ठीक है; कितने लोग थे?"

"मुझे मिला कर सात ।"

"लड़कियाँ भी थीं?"

"नहीं सा’ब, हम सब दोस्त ही थे, सब मर्द - स्टैग पार्टी ।"

"क्या किया वहाँ?"

"वही साहब जो पार्टी में होता है, म्यूज़िक, डांस, खाना और पीना..."

"और ड्रग्स भी?"

"नहीं सर, नो ड्रग्स!"

"हम्म... कितने बजे तक चली तुम्हारी यह स्टैग-पार्टी?"

"तक़रीबन साढ़े-बारह तक!"

"फिर?"

"फिर क्या? फिर हम सब अपने-अपने घरों को निकल लिए..."

"कहाँ?"

"तीन लोग बहादुरगढ़ के ही थे, एक रोहतक चला गया, दो गुड़गाँव और मैं दिल्ली के लिए निकल आया!"

"दिल्ली आने वाले तुम अकेले ही थे?"

"जी..."

"कहाँ रहते हो दिल्ली में?"

"पश्चिम विहार ।"

थानाध्यक्ष (एसo एचo ओo) संसार सिंह ने मेरी तरफ़ मेरी हैसियत का जायज़ा लेने के लिए देखा... मैं ख़ुद थाने में हाज़िर हुआ था, मगर मेरी जाँच-पड़ताल ऐसे हो रही थी जैसे पुलिस वाले ख़ुद ही किसी मुजरिम को पकड़ लाए हों ।

मैंने उसकी अनुभवी निगाह का मंतव्य समझते हुए कहा...

"विरासत में मिला बाप-दादा का एक छोटा सा बंगला है ।"

"फिर से बताओ,” अब वह थोड़ा संतुष्ट लग रहा था, "एक्सीडेंट ठीक किस जगह पर हुआ?"

"साहब जब मेरी कार नांगलोई से गुज़र रही थी तो बस लाल-बत्ती से थोड़ा आगे निकल कर..."

"तुमने तो ज़ाहिर है पी हुई थी, वो बंदा भी शराबी था क्या?"

"मैं यक़ीन से नहीं कह सकता, लेकिन वो अचानक कहीं से निकल कर गाड़ी के सामने आ गया था!"

"फिर?"

"मैंने पूरी ताक़त से ब्रेक लगाया और गाड़ी को डिवाइडर की तरफ़ काटा..."

"हम्म..."

"परन्तु गाड़ी फिर भी उससे थोड़ा टकरा गई और वो उछल कर सड़क पर जा गिरा!"

"तुमने गाड़ी रोक कर उसको देखने की कोशिश नहीं की?" फिर से पुलसिया तेवर, "किसी ने तुम्हें देखा भी नहीं?!"

"उस वक़्त आधी रात को सड़क पर कोई नहीं था," मैं बोला, "और फिर मैं डर भी गया था..."

"शक़्ल-सूरत से पढ़े-लिखे लगते हो! उस बेचारे को डॉक्टरी इमदाद की ज़रुरत हो सकती थी!"

मैं नज़र झुकाए चुप-चाप बैठा रहा । अपनी उस हरकत पर मैं पहले ही शर्मिंदा था । दिमाग़ में तरह-तरह के ख़्याल आते रहते थे... उसको क्या हुआ होगा? मर तो नहीं गया बेचारा ग़रीब? यही वजह थी कि इस हादसे के एक महीना बाद, मैं ख़ुद, अपने ज़मीर के हाथों मजबूर होकर, नांगलोई पुलिस थाने पहुँचा हुआ था ।

मैंने सोच लिया था अनजाने में ही सही, अपने हाथों हुए उस जुर्म के लिए मुझे जो भी सज़ा मिलेगी, मैं क़ुबूल कर लूँगा... मगर अब इस बोझ के साथ घुट-घुट कर नहीं जियूँगा ।

फिर संसार सिंह ने ही ख़ामोशी को तोड़ा, "मुझे ऐसे कुछ ठीक याद नहीं, चेक करवाना पड़ेगा कि हमारे पास ऐसे किसी एक्सीडेंट की कोई रिपोर्ट आई थी उस रात, जिस में इस इलाक़े में सड़क दुर्घटना में कोई मरा, या गंभीर रूप से ज़ख़्मी हुआ, हो ।"

"तो करवाईए, सर ।"

"उसमें थोड़ा टाइम लगेगा, भई ।" वो बोला, "तुम अभी घर जाओ । जो ख़बर होगी मैं ख़ुद तुम्हें बता दूँगा - तुम्हारा विजिटिंग कार्ड तो मेरे पास है ही ।"

"ठीक है!" मैं धीरे से कुर्सी से उठते हुए बोला ।

"और हाँ, कहीं ग़ायब मत हो जाना!"

मैंने चुपचाप उसकी तरफ़ देखा, सोचते हुए कि अगर ऐसा ही करना होता तो मुझे ज़रुरत क्या थी… वहाँ अपने आप जाने की, और बाहर खड़ी अपनी गाड़ी की ओर चल दिया ।

काफ़ी दिनों के बाद उस रात मैं ठीक से सो पाया!

दो दिन बाद थाने से फ़ोन आया कि सिंह साहब ने मुझे याद किया है, मैं तुरंत थाने पहुँचा ।

संसार सिंह के पास दो लोग बैठे थे, जिनके जाते ही हवलदार के इशारे पर मैं फिर उसी कुर्सी पर जा बैठा, जहाँ से दो दिन पहले उठा था ।

घंटी बजा कर साहब ने दो चाय मँगवायीं, जिसके आने तक कोई कुछ न बोला । एक अजीब सा सस्पेंस भरा सन्नाटा! एक कप मेरी तरफ़ बढ़ा कर, दूसरा अपने पास खींचते हुए थानाध्यक्ष ने मेरी ओर देखा…

"भई तुम सच्चे तो हो ही, ख़ुशक़िस्मत भी हो!"

मैंने हैरानी से उसके मुंह की तरफ़ देखा ।

"उस रात पास की एक कंस्ट्रक्शन-साइट का एक मज़दूर चंद्रू, देसी शराब के ठेके से पीकर वापिस लौट रहा था । सड़क पार करते वक़्त थोड़ी धुंध और अँधेरे की वजह से उसको तुम्हारी गाड़ी दिखी नहीं; तुम्हारे लाख बचाने पर भी गाड़ी की एक साइड उसको लगी और वो गिर पड़ा ।”

संसार सिंह ने आगे बताया -

“और हैरानी की बात यह है कि उसको एक खरोंच तक नहीं आई! तुम्हारी गाड़ी वहाँ से निकलते ही वो उठा, कपडे झाड़े और अपनी साइट पर जाकर सो गया । मैंने यह सब ख़ुद उससे मिल कर दरयाफ़्त किया है ।"

मेरे मुँह से कोई शब्द न निकला, बस मैं एक-टक सिंह साहब को देखता रहा...

“सबसे अहम बात यह है कि वो तुम्हारे ख़िलाफ़ कोई शिक़ायत भी दर्ज नहीं करवाना चाहता! सो, यू आर फ़्री टू गो!”

मैंने मन ही मन ऊपर वाले का लाख-लाख शुक्रिया अदा किया, उठा और बाहर की तरफ़ चल दिया…

मेरी अंतरात्मा अचानक बहुत हल्का महसूस कर रही थी ।

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