आकाश बाबू  PREM KUMAR KULDEEP

आकाश बाबू

यह कहानी एक छोटे से गाँव के उस होनहार बालक के जीवन पर आधारित है जो बड़ी कठिनाई और परेशानी से पढ़ लिख कर के बड़े अभियंता के रूप में पदस्थापित हुआ, जिसने अपने गाँव के विकास और प्रगति के लिए जी-जान एक कर दिया और गाँव की भलाई के लिए खूब कम किया।

पृथ्वीपुरा गाँव राजस्थान के दूरस्थ के जगहों में से एक है जहाँ पर आजादी के कई वर्षों बाद भी सड़क और परिवहन कि व्यवस्था नहीं थी। इस गाँव में बिजली थोड़े से वर्षों पहले ही आई थी। गाँव में स्कूल भी आजादी के बहुत वर्षों बाद तक नहीं खुले थे। बस जीवित रहें की मूलभूत एवं अतिआवश्यक जरूरतों की पूर्ति तक ही यह गाँव सीमित था। कपड़े, गहने और शादी विवाह या मृत्यु भोज आदि के सामान के लिए भी गाँव के लोगों को बहुत दूर शहरों तक जाकर खरीद कर लाना पड़ता था। लोगों के जीवन यापन का मुख्य जरिया या व्यवसाय खेती-बाड़ी एवं पशु-पालन ही था। गाँव के बच्चे अधिकांशत: खेल-कूद में ही अधिकतर अपना समय व्यतीत करते थे। महिलाएँ घरेलु कामकाज और बच्चों को पालने-पोसने और खेतों में मजदूरी करके अपनों का गुजारा करती थी। इस गाँव में जातिगत मतभेद और पाखंड तथा अन्धविश्वास का भी बोलबाला था। यूँ कहें तो गाँव की आर्थिक एवं सामाजिक हालत बहुत खराब थी। लेकिन बीते 15-20 वर्षों से गाँव मे थोड़ी बहुत खुशहाली या बदलाव की लहर आई परन्तु गाँव के एक होनहार बालक जो बड़ा होकर एक बड़े अभियंता के रूप में पदस्थापित हुआ था उसके परिश्रम एवं अथक प्रयासों से धीरे-धीरे गाँव में परिवर्तन की एक सुन्दर बयार दिखने लगी थी। बिजली के आगमन के बाद अब गाँव में दूरभाष सुविधा की भी शुरुआत हुई जिसकी वजह से गाँव के लोग अब अपने दूर-दराज को मित्रों और रिश्तेदारों से भी बातें होने लगी तथा देश और दुनिया की कई आवश्यक खबरे एवं जानकारियाँ साझा होने लगी। अब वहाँ पर ग्राम पंचायत का गठन भी हुआ जिसकी वजह से वहाँ पर कई मूलभूत सुविधाओं जैसे सड़क, नालियाँ, फुटपाथ एवं पीने के शुद्ध पानी के लिए टंकी आदि का भी निर्माण हो गया। गाँव के लोग काफी खुश रहने लगे। अब पृथ्वीपुरा के लोगों की भागीदारी विधान-सभा, लोक-सभा के चुनावों में भी होने लगी और उनके मतों को एक नई पहचान मिलने लगी जिससे गाँव वालों का महत्व बढ़ने लगा तथा गाँव में राजनैतिक सरगर्मियाँ भी होने लगी।

पृथ्वीपुरा इस परिश्रमी एवं सेवाभावी व्यक्ति गगन कुमार के प्रभाव से धीरे-धीरे गाँव के लोगो की माँगों को सरकार द्वारा तवज्जो दी जाने लगी। अब वहाँ प्राथमिक स्वस्थ केन्द्र और स्कूल खुल गया। गाँव के बच्चे बहुत खुश थे। अब बच्चे मन लगाकर पढाई करने, स्कूल जाने लगे। स्कूल पहले पाँचवी तक था फिर आठवीं तक क्रमोन्नत हुआ। फिर बच्चों के रुझान और पढाई के स्तर को ध्यान में रखते हुए वह माध्यमिक विद्यालय के रूप में क्रमोन्नत हुआ। बच्चे खुश थे की अब दसवीं बोर्ड तक की पढ़ाई एवं परीक्षा गाँव में होगी। खेती, हरियाली और पानी की उपलब्धता वहाँ क्रमिक विकास और उन्नति की कई संभावना नजर आने लगी।

इस गाँव में पहली कक्षा से दसवीं कक्षा तक पढ़ने वालों छात्रो में एक बहुत ही होनहार बच्चा था गगन कुमार। वह पढ़ने में सबसे तेज था हालाँकि उसके घर में बिजली नहीं थी क्योंकि उसके पिताजी काफी गरीब थे। वे बिजली का कनेक्शन नहीं ले पाए क्योंकि बिजली बिल के मासिक रुपये भरने के लिये उनके पास पैसे नहीं थे। बस दो-जून की रोटी का जुगाड़ भी वे बड़ी मुश्किल से कर पाते थे। उनके पास जमीन नाम पर एक छोटा सा टुकड़ा था जिस पर बहुत कम खेती की फसल होती थी जिससे परिवार के लिए उनका साल भर का राशन का जुगाड़ भी नहीं हो पाता था। परन्तु फिर भी गगन दिनभर पढ़ाई करता रहता था और रात को रोड़ लाईट के नीचे अपना गृह कार्य करता था। गगन अच्छा और मेहनती विद्यार्थी होने के कारण हमेशा कक्षा में प्रथम आता था। उसने दसवीं परीक्षा में बोर्ड में पूरे राजस्थान में टॉप किया था। पूरा गाँव खुश था। उसके उत्तीर्ण होने के बाद दूर-दूर से अखबार वाले, टेलीविजन वाले गाँव में आए और उसका तथा उसके माता-पिता एवं गाँव वालों का साक्षात्कार लिया गया जिस वजह से यह गाँव यकायक देश और दुनिया में छा गया। अब कई अखबारों में गगन और साथ ही गाँव की तस्वीरें और कहानी भी अख़बारों में प्रकाशित होने लगी। नेताओं और प्रशासन ने भी अब गाँव कि तरफ ध्यान देना प्रारंभ कर दिया। गाँव में अच्छी सड़कें बनने लगी जो कई शहरों को जोड़ रही थी। अब गाँवों में खेती के लिये मोटरें, ट्रेक्टर एवं अन्य उपकरण और साधन आने लगे इसके अलावा कढाई, बुनाई, सिलाई के व्यवसाय भी खुलने लगे। गाँव के माध्यमिक स्कूल को अब उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में क्रमोन्नत कर दिए गया। अब गाँव में दुकाने और खाने-पीने की छोटी-मोटी होटलें भी खुलने लगीं। गाँव अब काफी खुशहाल और आर्थिक रूप से भी संपन्न होने लगा एवं विकास के पथ पर आगे बढ़ने लगा। गगन निरंतर नई ऊँचाइयाँ छूने लगा। अब वह बारहवीं उत्तीर्ण करके इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने शहर चला गया।

चूँकि गगन को गाँव के सभी लोग शुरू से ही पसंद करते थे उसकी हर बात मानते थे कोई उसे गगन तो कोई अम्बर भैया तो कोई गगन सर कहते थे। लेकिन गाँव के एक बहुत ही सौम्य और जानकार व्यक्ति दीपचंद जी तो आकाश के दसवीं पास होने के बाद से ही हमेशा उसे ‘आकाश बाबू’ कहकर पुकारने लगे।

इंजीनियरिंग पूरी होने के बाद उसकी एक सरकारी महकमें में बड़ी पोस्ट पर नौकरी लग गई। नौकरी लगने के बाद जब वो पहली बार गाँव आया तो गाँव के सभी लोग इकठ्ठा हो रखे थे। सब लोग गगन से बातें कर रहे थे। गगन ने गाँव के लोगों को शहर के विकास, वहाँ की सड़कों, हवाई अड्डे, बड़ी-बड़ी ऊँची इमारतों, रेल्वे स्टेशन और परिवहन व्यवस्थाओं के बारे में विस्तार से अवगत कराया और उन्हें आधुनिक वैज्ञानिक सोच और तकनीक से कैसे हम समय एवं पैसों की बचत कर अपने रोजगार, कृषि एवं अन्य व्यवसायों को हम आसान बना सकते हैं और अधिक मुनाफा भी कमा सकते हैं आदि विस्तार से समझाया। गाँव के वृद्ध दीपचंद जी ने इतनी भीड़ में जब गगन को ‘आकाश बाबू’ कह कर आवाज़ दी तो गगन एकदम इमोशनल हो गया और उसने उनके पाँव छूकर कहा – “काका, आप मुझे आकाश बाबू कह कर बड़ा क्यों बनाते हो, मैं तो आपका वही छोटा-सा खेलता कूदता बच्चा हूँ। मुझे इस तरह बड़ा बना कर मुझे आप से और गाँव से दूर मत करो।" तब दीपचंद ने कहा – “नहीं बेटा, मैं आपको गाँव से दूर नहीं कर रहा अपितु मैं तो पूरे गाँव की तरफ से आप पर गर्व का अनुभव कर रहा हूँ। तुमने इतनी ऊँची पढ़ाई कर एक बड़े इंजिनियर बने हो यह तो हमारे गाँव का सौभाग्य है और उससे भी बड़ी बात तो यह है कि तुम इतने पढ़ लिख कर नौकरी पाकर गाँव से जुड़े रहना चाहते हो जबकि मेरा अनुभव कहता है कि कहाँ पढ़े लिखे लोग आजकल गाँव से जुड़ा रहना चाहते हैं वो तो पढ़ लिखकर शहर के या विदेश के हो जाते हैं पर ये तो खुशी की बात है कि तुम इस गाँव से और अपने परिवार से जुड़े रहना चाहते हो।इसलिए मैं तुम्हे ‘आकाश बाबू’ कहता हूँ क्योंकि तुम्हारा हृदय और मन विशाल है जो सभी लोगों से जुड़ा रहना और लोगों के सुख-दुःख में साथ निभाना चाहता है और तुम आकाश की तरह हमेशा ऊँचे बने रहो पर सदैव इस देश, इस गाँव की मिट्टी से जुड़े रहो यह हमारे लिए काफी है और यही हमारी तुम और तुम्हारे परिवार के लिए शुभकामना है बेटा।" तब आकाश ने धन्यवाद देते हुए दीपचंद से पूछा- “तो अब बताओ काका, आप क्या कुछ पूछना चाह रहे थे।” तो दीपचंद ने कहा- “बेटा यह बताओ कि गाँव को हम कैसे आधुनिक वैज्ञानिक प्रयोगों और तकनीक से अच्छा बना सकते है, आत्मनिर्भर बना सकते हैं।” तथा क्या कोई फैक्ट्री या उद्योग यहाँ पर आरम्भ किया जा सकता है?

तब आकाश ने बताया कि काका हमारे देश में किस तरह श्वेत क्रांति के जनक श्री कुरिअन वर्गिस ने सहकारी आन्दोलन से गुजरात के दूर-दूर के गाँवों से दूध को संगृहीत तरीके से इकठ्ठा कर “अमूल” के रूप इतिहास खड़ा कर दिया जो आज दुग्ध उत्पादों का एक बड़ा सहकारी उद्योग है। ऐसे ही हरित क्रांति के जरिये कृषि की तकनीक एवं उत्पादन में जबरदस्त विस्तार हुआ है। उसने आगे बताया कि किस तरह डॉ. अब्दुल कलाम ने विज्ञान और रक्षा के क्षेत्र में प्रगति कर मिसाल खड़ी कर दी और डॉक्टर होमी जहाँगीर भाभा ने अपने अनुभव और ज्ञान से देश में परमाणु ऊर्जा का अनुसन्धान और विकास किया जिसके परिणामस्वरूप आज देश में परमाणु ऊर्जा जीवन विभिन्न क्षेत्रों – कृषि, चिकित्सा, विद्युत् आदि में अपना अभूतपूर्व योगदान दे रही है।

उसने आगे बताया कि राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के चरखे ने गाँवों को रोजगार तो दिया ही पर उन्होंने इस चरखे से देश आजादी कि लहर खड़ी कर दी और विश्व के सबसे अद्भुत एवं विस्तृत हमारे देश के संविधान के रचनाकार डॉ. भीमराव आंबेडकर जी ने किस तरह से कमजोर और पिछड़े वर्ग के लोगों को, श्रमिकों और महिलाओं एवं देश के प्रत्येक नागरिक को उनके मौलिक अधिकार दिला कर गाँव-गाँव और गली-गली में लोगों को अभिव्यक्ति की आज़ादी दिलाई और शिक्षा हेतु जगह-जगह स्कूलों की स्थापना करवाई जिससे छोटे से छोटे गाँव के बच्चे भी पढ़ लिख सकें और वो सम्मान के साथ जीवन बिता सकें।

गगन कुमार ने आगे सभी गाँव वालों को विस्तार से बताया कि हम आधुनिक तरीकों से खेतीबाड़ी कर के अधिक उत्पादन लेकर हमारे धन और सुविधाएँ प्राप्त कर सकते हैं तथा हमारे उत्पादनों को देश के बड़े-बड़े शहरों में ही नहीं बल्कि विदेशों में निर्यात कर अधिक मुनाफा ले सकते हैं। साथ ही आधुनिक तकनीकी से परिपूर्ण दूसरे व्यवसाय जैसे रंगाई, बुनाई, कशीदा-कढाई, हैंडलूम, कपड़े, अन्य कलाकृतियाँ, हाथ से बने सामान जैसे अगरबत्ती, मोमबत्ती, लकड़ी के खिलौने, चमड़े के सामान, आदि छोटे-मोटे व्यवसाय गाँव में खोल कर गाँव को आर्थिक रूप से संपन्न बना सकते है, स्वावलंबी बना सकते हैं। इसके अलावा गोबर आदि से हम अच्छी खाद बना सकते है, बिजली बना सकते है तथा इससे बायो (डीजल) गैस आदि बना कर परिवहन व्यवस्था को सुधार सकते हैं जिससे प्रदूषण भी नहीं होगा और हमें अतिरिक्त आय भी होगी। यह सब सुनकर सभी गाँव वाले खुश हुए और इन सब जानकारियों के लिये उसका खूब धन्यवाद किया। गाँव की एक छात्रा विमला ने पूछा कि भैया इसका अर्थ तो यह है कि गाँव में भी उद्योग धंधों से आय बढ़ाने और विकास की इंतनी सम्भावनाएँ हैं हमें आश्चर्य है ? तब गगन ने कहा विमला तुमने बिलकुल सही कहा और सही समझा है। साथ ही गाँव वालों ने कहा गगन बेटा अब तुम्ही इस गाँव के कर्णधार हो जैसे चाहो इसे बना सकते हो| हम सब बिना किसी मतभेद के तुम्हारा सहयोंग करेंगें।

अब गगन कुमार ने अपने कुछ सरकारी प्रभाव और स्थानीय लोगों एवं नेताओं से मिलकर गाँव के विकास और वहाँ पर कुछ उद्योग स्थापित करने का बीड़ा उठाया और पृथ्वीपुरा ग्राम विकास सहकारी समिति के नाम से संस्था बना कर सरकार से सब्सिडी एवं बैंको से ऋण लेकर डेरी फैक्ट्री, बिस्किट्स बनाने की फैक्ट्री, रेडी मेड कपड़े बनाने की फैक्ट्री, हस्तकला के आकर्षक सामान, मिट्टी के सुंदर बर्तन बनाने का कारखाना आदि की स्थापना करवाई जिससे गाँव के लोगों की आमदनी अच्छी बढ़ने लगी और यहाँ पर बनाए गए सामान की बिक्री देश के कोने-कोने में होने लगी तथा पृथ्वीपुरा एक ब्रैंड नाम बन गया क्योंकि यहाँ के हर उत्पाद पर मेड इन पृथ्वीपुरा लिखा जाने लगा। इसके साथ ही गगन कुमार ने बड़े-बड़े शहरों से कई मशीनें एवं उपकरण मँगवाए ताकि गाँव में किसी भी व्यक्ति को नालियों, सड़कों एवं गंदगी आदि की सफाई अपने हाथों से न करनी पड़े, उसके लिए विदेशों की तरह पूरा मेकेनिज्म सिस्टम से गाँव की सफाई होने लगी। उसने गाँव के सभी लोगों को अपने-अपने घरों और घरों से सामने की सफाई खुद को करनी होगी इसके लिए सभी को राजी करवाया और गाँव में समयबद्ध तरीके से कचरा बीनने के लिए ग्राम पंचायत द्वारा व्यवस्था करवाई गई। गाँव में सभी घरों में पर्याप्त पानी की सुविधा के साथ आधुनिक शौचालय एवं अपशिष्ट पदार्थों की निष्पादन के लिए ऑक्सीडेशन पोंड आदि स्थापित किए गए जिससे किसी भी प्रकार की गन्दगी गाँव में न हो और समूचा गाँव स्वच्छ, साफ, सुंदर और सबके लिए एक उदहारण के रूप में जाना जा सके।

गगन कुमार इतने पर ही नहीं रुका अपितु अपनी सकारी विभाग की जिम्मेदारियाँ बखूबी निभाते हुए, अपनी व्यक्तिगत छुट्टियाँ लेकर गाँव में रह कर समस्त ग्रामवासियों के बीच पारस्परिक सामंजस्य स्थापित किया और लोगों को बिना किसी जातिगत एवं धार्मिक मतभेद के साथ रहना, साथ खाना-पीना सिखाया और सभी के मन में यह विचार बिठाया की सब मनुष्य एक हैं, जब सभी का रक्त लाल है तब उन्हें जाति और धर्म के गलत आधार पर उन्हें काला, पीला, नीला आदि क्यों बनाया और समझा जाए। उसने सभी ग्रामवासियों और आस-पास के गाँवों के लोगों को न केवल समझाया बल्कि शिक्षित किया की हम सभी अल्लाह और भगवानों, ज्योतिष और पूजा-पाठ के नाम पर जो अपना कीमती समय और पैसा खर्च कर रहे है वो सब व्यर्थ है। समाज का एक वर्ग, एक समुदाय चाहे वह मुल्ला-मौलवी, पीर-फ़कीर हो बाबा-वाबा पंडित-पुजारी हो यह सब समाज को ऐसा डरा कर, भ्रमित कर इतना पाखंड और अन्धविश्वास फैला चुके हैं जिसके कारण समाज में अनेक रुढ़िवादी कुरीतियाँ और कुप्रथाएँ फैली हुई हैं उनको समाप्त कर एक नवीन सोच स्थापित करना जरुरी है।

गगन कुमार की प्रेरणा, अनुरोध एवं प्रयास से लोगों को धीरे-धीरे समझ में आया और आज उसका अपना गाँव पृथ्वीपुरा इस धरती, पृथ्वी के लिए सबसे सर्वोत्तम, आदर्श, और अनूठा गाँव साबित हुआ है जहाँ पर न कोई पाखंड है न कोई अन्धविश्वास साथ ही इन्सान-इन्सान के बीच कोई कोई मतभेद नहीं है। ज्यों-ज्यों गाँव के लोगों की आमदनी बढ़ गई, वहाँ की जनसँख्या में भी वृधि हुई। अब वहाँ पर लोगों का जीवनस्तर भी सुधरने लगा, कई सारे रोजगारपरक उद्योग होने के कारण धीरे-धीरे इस गाँव में शहरों को जोड़ती हुई सुंदर सड़कें, सामुदायिक भवन, स्कूल, ग्रामविकास भवन, अस्पताल, बच्चों के लिए पार्क आदि बना कर गाँव का खूब विकास किया गया।

पिछले कई वर्षों से इस गाँव की देश और दुनिया में खूब तारीफ हुई और अखबारों और टेलीविज़न पर हर वक्त यह गाँव छाया रहा जिसके परिणामस्वरूप वर्ष 2013 में संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठन द्वारा विश्व के सर्वोत्तम शैक्षिक, सामाजिक एवं आर्थिक रूप से विकसित ग्राम का अवार्ड दिया गया जिसमें सौ करोड़ रूपये और प्रशस्ति पत्र दिया गया और एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी बनाई गई जिसे पूरे विश्व की संसदों एवं विधान सभाओं में विकास मॉडल के रूप में दिखाया गया जिसके बाद देश और दुनिया के कई गाँवों का काया पलट हो गया था और यह निरंतर जारी है। पृथ्वीपुरा गाँव में यूनेस्को से प्राप्त इस धनराशी से अब कई नए उद्योग धंधे खोले गए और इस गाँव की प्रगति दिन-दुगुनी रात-चौगुनी हो रही है। गगन कुमार जैसे होनहार बालक अब कई गाँवो में मिलने लगे हैं जो गाँव की प्रगति और विकास के लिए न केवल सोचते हैं बल्कि बहुत कुछ कर के दिखा रहे हैं।

अपने विचार साझा करें



  परिचय

"मातृभाषा", हिंदी भाषा एवं हिंदी साहित्य के प्रचार प्रसार का एक लघु प्रयास है। "फॉर टुमारो ग्रुप ऑफ़ एजुकेशन एंड ट्रेनिंग" द्वारा पोषित "मातृभाषा" वेबसाइट एक अव्यवसायिक वेबसाइट है। "मातृभाषा" प्रतिभासम्पन्न बाल साहित्यकारों के लिए एक खुला मंच है जहां वो अपनी साहित्यिक प्रतिभा को सुलभता से मुखर कर सकते हैं।

  Contact Us
  Registered Office

47/202 Ballupur Chowk, GMS Road
Dehradun Uttarakhand, India - 248001.

Tel : + (91) - 7534072808
Mail : info@maatribhasha.com