कर्मयोग  ARUN KUMAR SHASTRI

कर्मयोग

मानवीय जीवन के अनुभव के रूप में क्रियमान कार्य या पूर्व कर्म आपके लिए एक उदाहरण के रूप में कथा किवदंतियों के रूप में स्थापित हो जाते हैं, ऐसा ही मेरे जीवन का एक घटनाक्रम इस कहानी की भूमिका के रूप में प्रस्तुत है।

सिर्फ 3 साल का बच्चा और वो भी कंप्यूटर युग से 30 साल पहले का, कोई सोच नहीं सकता कि उसकी सोच या यादाश्त कितनी होगी, फिर भी मुझे सब याद है। मेरे घर मेरी कुंडली दिखाने के लिए एक पंडित जी को बुलाया गया। मेरी कुंडली में मेरे जन्म के साल का कुछ भ्रम था, उन्होंने मुझे देखा, मेरा माथा देखा, कुंडली पत्री देखि तो उठ के जाने लगे। क्रोधित से, मेरे माता-पिता और 6 भाई बहिन सब सकते में आ गए। पिता जी बोले, "विप्र क्या हुआ? आप क्रोधित न हों, हमे बताइए, क्या भूल हुई क्या अपमान हुआ?" पंडित जी बोले, "नहीं-नहीं आपसे क्या अपमान होना, मेरी ही मति मारी गई थी जो चला आया।" अब सभी और भी दुखी हुए, पिता जी ने फिर आग्रह किया, "पंडित जी कृपया माफ़ कीजिए, ऐसे न जाएँ, बैठिए! माँ उनके लिए केसरवाला दूध लेके आई, वो बैठ गए, दूध पिया, मुँह पोंछा, फिर खिन्न मन से बोले, "आपका ये लड़का आपको सबसे अधिक प्यार, सम्मान, इज्जत देने वाला है, ये इसके माथे पर लिखा है, लेकिन इसकी ये कुंडली इसके जन्म वर्ष की नहीं है ये उसके विपरीत ज्यात्मीय प्रसंग दे रही है। इसका क्या कारण है ये बताईये। "माँ सन्न रह गई, उसने हम सब बच्चों का हाथ पकड़ दूसरे कमरे में ले जाकर बंद कर दिया।

अब हम सब रोने लगे, समझे नहीं कि क्या हुआ। बड़ी बहिन फिर उससे छोटी 2, फिर मैं, फिर 2 बहनें और हम सब एक दूसरे से चिपके असमंजस में लेकिन कान दरवाजे पर। मैंने क्या सुना, माँ जो पंडित जी को बता रही थी। असल में पंडित जी - ये लड़का हमारा नहीं है, इसके माँ बाप इसको विदेश यात्रा पर जाते समय 3 माह की अवस्था में हमे सौंप गए थेI वो बहुत निर्धन थे और एक अंग्रेज साहब के साथ धन कमाने की इच्छा हेतु चले गए। जिनकी शर्त ये थी कि बच्चा नहीं जाएगा, मजबूरी में वो ये सब सह कर इसे मुझे दे गए। फिर उनके जाने के बाद यात्रा में इसके पिता की तबीयत बिगड़ी और समुद्री मौसम का अभ्यस्त न होने के कारण उनका देहावसान हो गया। माँ आधे रास्ते से वापिस न आ सकती थी सो उस दुःख में भी उसे अकेले असहाय विदेश जाना पड़ा I अब आप समझ गए होंगे कि यह कुंडली हमने एक माह पहले शहर से बनवाई कि देखें इसका भाग्य क्या कहता है। फिर आपकी प्रसिद्धि के कारण आपको कष्ट दिया सही-सही ज्ञान के लिए। हमें बहुत ख़ुशी है कि आपने हमे सच बोलने पर आमादा किया, आपके ज्योतिष ज्ञान को चरण वन्दना, अब आप कृपया इसका सही-सही मूल्यांकन कीजिए। पंडित जी बोले, "जो मैंने पहले कहा अब तक सब वही होगा लेकिन इसके लाख चाहते भी आप दोनों कभी इस पर भरोसा न कर पाएँगे। उसका कारण इसका नहीं आपका भाग्य है। ऐसे पूत का आप अपनी जरावस्था में लाभ अपने ही प्रारब्ध के चलते न ले पाएँगे और आज मैं अर्थात वो बालक लाख समझाने के भी अपने सांसारिक माता पिता की सेवा से उनके अपने विवेक और सोच के चलते लाभ न ले पाया I मैंने अपने को समझा लिया, मेरी असली माँ का कभी भी पता न चला, न उनसे कोई सम्पर्क रह सका। मैं जब तक सम्भला आयु अनुसार भी उनके होने की सम्भावना न के बराबर थी।लोग पूत को दोष देते हैं कि अपने माँ-बाप की देखभाल उनकी वृधावस्था में नही की, यहाँ क्या गणित बनेगा मैं क्या कहूँ। आप पाठक गण ही निर्णय कीजिए।

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