आओ चलें नाना के घर  Abhishek Pandey

आओ चलें नाना के घर

बाल मन के अपनी गर्मी की छुट्टी में नानाजी के घर जाने के उत्साह का वर्णन

आज मैट्रिक की परीक्षा का अंतिम इम्तिहान था। साँझ हो रही थी। सूरज क्षितिज में ओझल होने की कगार पर पहुँच चुका था। थके मांदे किसान और दाने की खोज में निकले पक्षी अब अपने-अपने बसेरे की ओर लौट रहे थे। राम और महेश दोनों परीक्षा देकर घर लौट आए थे। विद्यालय में तीन महीने की छुट्टियाँ घोषित कर दी गयीं थी। पूर्व की भांति इस बार भी नानाजी का घर ही उन दोनों का एकमात्र गंतव्य था। दोनों स्कूल से लौटकर अपने सुनहरे भविष्य की कल्पना में खोए हुए थे। जैसा कि अक्सर घरों में होता है, माताजी बच्चों के मुआमलों में हाई कोर्ट और पिताजी सुप्रीम कोर्ट का काम करते हैं और बच्चे अपने फायदे के हिसाब से दोनों जगह याचिका दायर कर सकते हैं। राम और महेश माताजी के पास बैठे तो थे पर वास्तव में वे दोनों अपनी-अपनी कल्पनाओं में गतिशील थे। तभी अचानक सुप्रीम कोर्ट के मुख्य जज पधारे। राम और महेश दोनों अपनी अपनी याचिका लेकर उनके सामने उपस्थित हुए।

राम - पिताजी, हम लोगों की तीन महीनों कि छुट्टियाँ बोल दी गयीं हैं। तो आप ...........
महेश बीच में ही बात काटकर बोल पड़ा - आप नानाजी को फ़ोन कर दीजिए कि वो कल ही आ जाएँ और हम लोगों को लिवा जाएँ।
पिताजी तेवर बदल कर बोले - तुम लोगों को बस यही सूझता है। इस बार तुम लोगों का मैट्रिक पूरा हो गया है अभी कुछ दिनों में प्रवेश परीक्षा देनी पड़ेगी किसी कॉलेज में दाखिले के लिए। इस बार तुम दोनों कहीं नहीं जाओगे, यहीं रहो। बहुत घूम चुके, अब छोटे नहीं हो। और एक बात कल से एक मास्टर साहब तुम्हें सुबह-शाम पढ़ाने आएँगे तो अपना समय अच्छी तरह से व्यवस्थित कर लेना।

पिताजी की बातें उन दोनों को ऐसी लगीं मानो किसी ने पूरी कटार सीने में उतार दी हो। दोनों पिताजी की ओर ऐसे घूर रहे थे जैसे कोई अपराधी फाँसी की सजा पाने के बाद जज को घूर रहा हो। दोनों की सारी आशाएँ काँच की भाँति टूट कर बिखर चुकी थीं। पर वे दोनों अभी भी नाना प्रकार की युक्तियाँ सोच रहे थे ताकि अपनी चिरसंचित अभिलाषा को धूल-धूसरित होने से बचा सकें।

कुछ क्षणों के लिए वातावरण मानो मौन का मूर्ति रूप बन गया था। तभी अचानक महेश उछल पड़ा, बोला - "राम, युक्ति मिल गई, पिताजी की ना को हाँ में बदलने का एक ही रास्ता है, माँ से सिफारिश।" इतना सा व्यवहारिक ज्ञान तो बालक भी रखतें हैं कि पिता बालक के स्वर्णिम भविष्य के लिए उसे वर्त्तमान में पीड़ा में देख सकता है, पर माँ बालक को वर्तमान में पीड़ा में नहीं देख सकती क्योंकि उसका हृदय बड़ा मृदुल होता है, उसमें पिता की तरह दिव्यदृष्टि चाहे ना हो पर प्रेम अपने विशुद्ध रूप में विद्यमान रहता है।

दोनों माताजी के पास पहुँचे। माँ सब्जियाँ काट रही थी। दोनों को उदास और गुमसुम देखकर पूछा - "क्या हुआ ? तुम दोनों मुँह काहे लटकाये हो।" राम थोड़ा सा और उदास मुखड़ा बनाकर बोला - "माँ, वो पिताजी हमें कल नानाजी के यहाँ नहीं जाने दे रहे हैं।"
महेश - हाँ, पिताजी कह रहे हैं कि इस बार गर्मियों की छुट्टियों में तुम लोग कॉलेज कि प्रवेश परीक्षा की तैयारी करोगे।
माताजी - सही ही तो कह रहे हैं, वहाँ रहोगे तो दिन भर मटरगश्ती करते फिरोगे यहाँ दो अक्षर पढोगे लिखोगे।

पर माता का हृदय ज्यादा देर तक कठोर ना रह सका। राम और मोहन ने रह रहकर अपनी भाव भंगिमा और अश्रुओं की धारा से माँ के प्रेम को उद्दीप्त कर दिया और जल्द ही प्रेम ने कर्त्तव्य को पराजित कर दिया। माँ बालकों का पक्ष रखने सुप्रीम कोर्ट जाने को राजी हो गयीं। और फिर तो वही हुआ जो अतीत से होता चला आ रहा है, माँ ने पति को परास्त कर दिया। संभव था कि एक पत्नी के रूप में वो हार जाती पर एक माँ को तो ईश्वर भी नहीं हरा सकता तो फिर पामर मानव की बिसात ही क्या है? नानाजी को सूचना दे दी गई, कल की तैयारी पक्की हुई। राम और महेश तो ऐसे प्रसन्न हुए मानो किसी रेत पर तड़पती मछली को किसी ने पुनः सागर में डाल दिया हो। जैसे-तैसे मधुर स्वप्न देखते-देखते सुबह हुई। दोनों दरवाजे की बाट पर ही आसन जमाकर बैठ गए। आज उन्हें हर राहगीर नानाजी ही नज़र आ रहा था और हर तरफ नानाजी की बैलगाड़ी। आज उनकी प्रतीक्षा का प्रति पल युगों से भरा लग रहा था। उन्होंने ऐसी प्रतीक्षा तो कभी की ना थी, हाँ इसके विपरीत पक्ष का अनुभव जरूर किया था जब वे इम्तिहान में बैठते थे तो उनके १-२ घंटे तो सेकंडों में बीत जाते थे। बिना पलक झपकाए राह देखते-देखते आँखों में आँसू आने लगे थे। अचानक एक बैलगाड़ी आकर द्वार पर रुकी, एक अधेड़ व्यक्ति जो सदरी और धोती पहने हुए थे, बैलगाड़ी से उतर कर खड़े हो गए। राम और मोहन ने ध्यान से देखा, अरे नानाजी ! दोनों उनके गले से लिपट गए। अब घर पर एक पल भी ठहरना भारी हो रहा था उन दोनों के लिए। दोनों ने माँ-पिताजी के चरण छुए और झट से बैलगाड़ी के ऊपर बैठ गए। राम ने बैलों को एक चाबुक लगाई और धीरे-धीरे बैलगाड़ी क्षितिज के उस पार चली गयी।

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