सफलता की ललक  सलिल सरोज

सफलता की ललक

सफलता और असफलता के बीच की ज़िंदगी

"तुम्हें बारिश कैसी लगती है?" सौम्या ने झमाझम बरसते हुए बूँदों की तरफ देखकर कमल से पूछा।
"ये बारिश मुझे बिल्कुल तुम जैसी लगती है", कमल ने बड़ी खूबसूरती से सौम्या के सवाल का जवाब दिया।

"कैसे?" अब की बार सौम्या ने उत्सुकता से लबरेज़ होकर कमल से पूछा।

कमल सौम्या की आँखों में आँखें डाल कर और सौम्या का हाथ अपने हाथों में लेकर बोला, "गौर से देखो सौम्या। ये बारिश की झीनी-झीनी बूँदें को एक साथ देखो तो तुम्हारे घने ज़ुल्फ़ों का गुमान सा होता है। जब ये बारिश की बूँदें धरती के सीने से लिपटती हैं, तो उसकी सारी पीड़ा, वेदना, व्यथा भाप बनकर कहीं उड़ जाती है और धरती को बेहद सुकून मिलता है। उन्हीं बूँदों की तरह जब तुम मेरे सीने से लग जाती हो तो मेरी सारी परेशानियाँ, उलझनें, घबराहट दूर हो जाती हैं और मुझे एहसास होता है कि मैं दुनिया की हर बेशकीमती चीज़ हासिल कर सकता हूँ। ये बारिश धरती के जिस्म को धो कर उसे किसी नवजात बच्चे की भाँति नवीन और नूतन कर देती है। तुम्हारे प्यार के साए में मुझे भी किसी माँ के आँचल की ठंडक मिलती है।"

कमल की बातों में पता नहीं क्या जादू था कि सौम्या उसके चेहरे में कहीं खो सी गयी थी। "अरे, तुम कुछ सुन भी रही हो या फिर मैं इस बारिश से ही बातें किए जा रहा हूँ", कमल ने सौम्या को झकझोरते हुए पूछा।

"कमल, चलो न हम भी बारिश में भींगते हैं। देखो ना, कितने सारे लोग बारिश का मज़ा ले रहे हैं। उनको देखो, ऐसा लग रहा है कि वो बारिश का आनंद ही नहीं ले रहे बल्कि उसको पी भी रहे हैं। ये लोग बारिश को जी रहे हैं।" सौम्या, कमल को बारिश में खींचते हुए बोली।

"सौम्या, ये बेवकूफी मैं नहीं करूँगा। मैं बीमार पड़ जाऊँगा। तुम्हें जाना है तो जाओ, मैं यहीं इंतज़ार करूँगा।" कमल सौम्या से हाथ छुड़ाते हुए बोला। पर सौम्या कहाँ कमल की सुनने वाली थी। सौम्या ने कमल को धक्का देकर बारिश के बींचोंबीच लाकर खड़ा कर दिया। कमल किसी छोटे बच्चे की तरह बार-बार भागता रहा पर सौम्या भी अपनी ज़िद्द पर थी। आखिरकार कमल बारिश में सौम्या के साथ घंटों भीगता रहा। कमल भींग तो रहा था पर सौम्या की खूबसूरती जो बारिश के पानी से और भी निखर गई थी, उसको एक टक देखे जा रहा था। सौम्या पूरी मस्ती में उछल-कूद, भाग-दौड़ किए जा रही थी। कमल को सौम्या आज बेहद ही खूबसूरत नज़र आ रही थी। होंठों की लाली, आँखों का काजल, गालों को सुर्खी, सब में एक गज़ब का तीखापन आ गया था। सौम्या अपने खुले बालों से जब बारिश की बूँदों को झटक रही थी तो मानो कमल के बदन में हज़ारों वॉट के झटके लग रहे थे। पहले सौम्या कमल की बातों में खो गई थी, अब कमल सौम्या की खूबसूरती में खो चुका था। बारिश कब की बंद हो चुकी थी, सौम्या पास के टी स्टॉल से कमल को लगातार आवाज़ दिए जा रही थी पर कमल आँखें मूँदें किसी और ही दुनिया में खो चुका था। जब मोटर का हॉर्न कमल के कानों में पड़ा और वो धक्के खाते-खाते बचा तो वो वापस अपने होश में आया।

"अरे, तुम यहाँ कब आई?" कमल ने अचम्भे में भर कर सौम्या से पूछा।

"वाह!, मैं यहाँ दस मिनट से खड़ी हूँ, कितनी आवाज़ें दी तुमको, पर पता नहीं तुम कहाँ खोए थे। बताओ मुझे क्या सोच रहे थे।" सौम्या ने नटखट अंदाज़ से कमल को छेड़ते हुए पूछा। अब कमल क्या बताता कि वो सौम्या की खूबसूरती के भँवर में खोया था, जितना उबरने कि कोशिश कर रहा था, उतना ही डूबता जा रहा था।

"अरे, कहीं नहीं। मुझे नहीं पता था कि बारिश में भींगने में इतना मज़ा आता है। अब तो हर बारिश में भींगा करूँगा अगर तुम साथ हो", कमल ने अंतिम वाक्य बुदबुदाते हुए बोला।

"अच्छा सौम्या, क्लास भी खत्म हो गई है और काफ़ी मस्ती भी हो चुकी है, हमने बातों-बातों में कई कप चाय भी पी ली है, अब वापस अपने-अपने घर चलते हैं।

सौम्या और कमल दिल्ली में एक ही कोचिंग में सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करते थे। कमल इस साल सिविल सेवा परीक्षा का इंटरव्यू दे रहा था। हालाँकि दोनों और भी परीक्षाएँ साथ-साथ देते थे। सौम्या पारिवारिक और आर्थिक रूप से कमल से ज्यादा मज़बूत थी। सौम्या और कमल एक ही शहर के थे लेकिन उनकी जाति में भी ज़मीन-आसमाँ का अंतर था जो समाज को विवाह के लिए स्वीकार नहीं था। सौम्या और कमल को यह बात बहुत अच्छी तरह से पता थी सो दोनों ने यही रास्ता निकाला कि अगर अच्छी नौकरी मिल जाएगी तो समाज, परिवार, दोस्त सब राज़ी हो जाएँगे।

सिविल सेवा परीक्षा के नतीजे आए। कमल मेरी लिस्ट में 14 अंकों से पीछे रह गया और उसे एक पल को लगा कि उसकी ज़िन्दगी ही खत्म हो गई, तब सौम्या ने उसे हर तरह से सहारा दिया, साल भर को और कोई भी रिजल्ट नहीं आया फिर भी।

अगले साल सौम्या और कमल दोनों की नौकरी सीएजी में एसएससी के द्वारा ऑडिटर के पद पर दिल्ली में ही लग गई। सौम्या अपनी नौकरी में पूरे दिल से लग गई पर कमल को चैन नहीं मिल पाया। नौकरी अच्छी थी, तो थोड़ा विरोध के बावजूद दोनों की शादी भी हो गई। कमल शादी के बाद भी उसी मेहनत और जोश से सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करता रहा। कमल 3 सालों में 3 मेन्स और 2 इंटरव्यू दे चुका था पर मेरिट लिस्ट में नहीं आ पा रहा था। इस क्रम में कमल तमाम इम्तहान पास कर चुका था, लेकिन जो करना चाह रहा था, वही नहीं हो पा रहा था।

इसका प्रतिकूल असर कमल के ऑफिस के काम पर भी पड़ना शुरू हो चुका था। कमल दफ्तर के कामों से जी चुराने लगा था। कहीं न कहीं उसकी असफलता उस पर हावी होती जा रही थी और इधर सौम्या अपने काम में परिपक्व होती जा रही थी। 3 सालों में सौम्या को 3 पदोन्नति मिल चुकी थी और कमल अब भी वहीं था।

दफ्तर का बोझ अब घर पर आने लगा था, कमल खुद को सौम्या का जूनियर मानने को तैयार नहीं हो पा रहा था। अपनी क्षमता और अपनी सफलता को याद कर के कमल कई बार रो पड़ता था। सौम्या कमल की स्थिति भली-भाँति समझती थी लेकिन ज्यादा कुछ बोल नहीं पाती थी। कहीं न कहीं कमल का पौरुष सौम्या पर हावी हो जाता था। पहले जो बातें प्यार से हो जाती थी अब उन्हीं बातों पर कमल चिल्लाने लगता था और सौम्या चुपचाप रोती रहती थी क्योंकि वो कमल की क्षमता को जानती थी इसलिए उसे और भी बुरा लगता था।

दफ़्तर में अब ये हवा भी चली कि कमल कभी सौम्या के लायक था ही नहीं। सौम्या कहाँ ऊँचे जाति की और कमल किस जाति का है पता भी नहीं। आज कमल यहाँ तक भी पहुँचा है तो सिर्फ सौम्या की बदौलत। अब यह रोज़ की बात हो चली थी, कमल अवसाद से घिरता जा रहा था। एक अदद बड़ी नौकरी के लिए उसकी ज़िन्दगी तबाह होती जा रही थी और जो लड़की उसकी जान थी और आज बीवी, वो आँखों की किरकिरी बन चुकी थी।

सौम्या से यह सब अब बर्दाश्त से बाहर हो चुका था। आज ऑफिस निकलने से पहले सौम्या ने कमल से बात करने की कोशिश की। "कमल, हम पूरी ज़िंदगी किसी एक चीज़ न मिलने के ग़म में इस तरह से नहीं जी सकते, तुमने मेहनत की है और आज भी कर रहे हो, समय से पहले और भाग्य से ज्यादा किसी को कुछ नहीं मिलता। अपनी ज़िंदगी में खुश और सकारात्मक रहना सीखो, सब मिल जाएगा।" पहले यही सारी सौम्या की बातें कमल को उसकी तरफ खींचती थी लेकिन आज ये बातें उसे उपदेश और ताना लग रहा था। कमल आवेश में आकर बोला, "सौम्या, तुमने जो चाहा, तुम्हें मिल गया। अतः तुम्हारे लिए ऐसा बोलना बहुत आसान है। तुम ऑफिस में मेरी बॉस हो, पर घर में बनने की कोशिश मत करो।"

"क्या कहा तुमने, मैंने जो चाहा मुझे मिल गया। मैंने तुम्हें आईएएस देखना चाहा था और जितनी मेहनत तुमने की है,उ तनी ही कुर्बानियाँ मैंने भी दी हैं। तुम्हारे हिसाब से जागना, सोना, खाना पीना, पहनना -ओढ़ना सब किया। मैं वो सौम्या रही ही नहीं जो तुम्हें मिली थी, मैं अब खुद को भी नहीं पहचान पाती। तुम्हारी पहचान बनाने के लिए मैंने अपनी ही पहचान मिटा दी और तुम इस तरह मुझे ज़लील कर रहे हो।" सौम्या रोती हुई बोली।

"नहीं चाहिए मुझे तुम्हारी बनाई हुई पहचान, तुम रखो ये तमगा अपने पास, जिस दिन मैं अपनी पहचान बना लूँगा, वापस आ जाऊँगा" और यह कहता हुआ कमल घर से चला गया।

सौम्या सूने घर को निहारती रही और सोचती रही कि उसकी गलती थी कहाँ - "प्यार करने में, मदद करने में या किसी के लिए अपना वजूद खोने में।"

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